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डेनमार्क के पूर्व सैनिकों का दूतावास के बाहर प्रदर्शन

अमेरिकी राष्ट्रपति के ग्रीन लैंड की जिद के खिलाफ प्रदर्शन

कोपेनहेगेनः सैकड़ों डेनिश पूर्व सैनिकों ने शनिवार को कोपेनहेगन स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर एक मौन विरोध प्रदर्शन किया। इनमें से कई सैनिकों ने मध्य पूर्व के युद्धों में अमेरिकी सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी है। यह विरोध ट्रंप प्रशासन द्वारा ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की धमकियों और युद्ध में डेनमार्क के योगदान को कमतर आंकने वाली टिप्पणियों के जवाब में था।

डेनिश वेटरन्स एंड वेटरन सपोर्ट ने एक कड़े बयान में कहा, डेनमार्क हमेशा अमेरिका के साथ खड़ा रहा है—जब भी अमेरिका ने कहा, हमने दुनिया के संकटग्रस्त क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। हम ट्रंप प्रशासन द्वारा उपेक्षित और उपहासित महसूस कर रहे हैं, जो जानबूझकर अमेरिका के साथ डेनमार्क के सैन्य संघर्षों की अनदेखी कर रहा है।

दिग्गजों का कहना है कि वे व्हाइट हाउस की उस बयानबाजी से बेहद नाराज हैं, जो नाटो सहयोगी डेनमार्क के क्षेत्र ग्रीनलैंड के आत्मनिर्णय के अधिकार की अवहेलना करती है। वे राष्ट्रपति ट्रंप के उस दावे पर भी कड़ा एतराज जताते हैं कि डेनमार्क आर्कटिक में पश्चिम के सुरक्षा हितों की रक्षा करने में असमर्थ है।

शनिवार को, दिग्गज सबसे पहले शहीद हुए डेनिश सैनिकों के स्मारक पर एकत्र हुए, फिर वहां से अमेरिकी दूतावास तक मार्च किया। दूतावास के बाहर उन्होंने पांच मिनट का मौन रखा—एक-एक मिनट डेनमार्क की सेना, वायु सेना, नौसेना, आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी और पुलिस के सम्मान में।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के साथ सेवा करने वाले और एक आईईडी धमाके में अपने दोनों पैर गंवाने वाले दिग्गज मार्टिन आहोम ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि वे क्रोधित और छला हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मैंने 9- 11 के बाद अमेरिका की मदद के रास्ते पर चलने के लिए बहुत कुछ कुर्बान किया है। मुझे गर्व था कि हम छोटा सा डेनमार्क भी बड़े देशों के साथ लड़ने में सक्षम थे। लेकिन मुझे लगता है कि अमेरिका ने अपनी आत्मा खो दी है।

अफगानिस्तान युद्ध में डेनमार्क के 44 सैनिक मारे गए थे, जो गठबंधन सेनाओं के बीच प्रति व्यक्ति मृत्यु दर के हिसाब से सबसे अधिक है। इसके अलावा इराक में भी 8 डेनिश सैनिकों की जान गई थी। दूतावास ने बाद में एक फेसबुक पोस्ट के जरिए स्पष्टीकरण दिया कि उनका इरादा डेनिश सैनिकों के बलिदान का अपमान करना नहीं था।

उन्होंने कहा, हमारे मन में डेनिश दिग्गजों और साझा सुरक्षा के लिए उनके बलिदान के प्रति गहरा सम्मान है। विरोध के बाद हटाए गए झंडों को लेकर भी विदेश विभाग ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा कर्मचारी आमतौर पर प्रदर्शनों के बाद छोड़ी गई वस्तुओं को हटा देते हैं, और उन झंडों को वापस लौटा दिया गया है।