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बजरंग दल के सदस्यों पर फिर से लगा सांप्रदायिक तनाव का आरोप

ढेंकानाल में पादरी पर हुए हमले में नौ गिरफ्तार

राष्ट्रीय खबर

भुवनेश्वरः ओडिशा के ढेंकानाल जिले में एक पादरी पर हुए हमले ने राज्य में बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं और मॉब लिंचिंग की ओर ध्यान खींचा है। 4 जनवरी को परजंग पुलिस थाना क्षेत्र में पादरी बिपिन नाइक पर कथित तौर पर बजरंग दल के सदस्यों द्वारा हमला किया गया, उनका चेहरा सिंदूर से रंगा गया और जूतों की माला पहनाकर उन्हें मंदिर के सामने झुकने के लिए मजबूर किया गया।

पुलिस ने इस मामले में नौ लोगों को हिरासत में लिया है। जून 2024 में भाजपा सरकार के गठन के बाद से ओडिशा के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। पिछले 19 महीनों के आंकड़ों और हालिया घटनाओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।

बालसोर में एक मुस्लिम युवक की गौ रक्षकों द्वारा लिंचिंग की गई, जबकि संबलपुर में पश्चिम बंगाल के एक युवक, ज्वेल शेख की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। पुलिस ने शुरुआत में इसे व्यक्तिगत विवाद बताया, लेकिन बाद में नफरत से प्रेरित अपराध के आरोप सामने आए।

भद्रक, खोरधा और कटक जैसे शहरों में पिछले कुछ महीनों में सांप्रदायिक दंगों के कारण इंटरनेट बंद करना पड़ा और कर्फ्यू लगाना पड़ा। कटक में दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा के बाद तीन दिनों का कर्फ्यू लगाया गया था। गंजम और मयूरभंज जैसे जिलों में बंगाली भाषी दैनिक वेतन भोगी मजदूरों को अवैध बांग्लादेशी होने के संदेह में भीड़ द्वारा पीटे जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय और एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या में भारी उतार-चढ़ाव आया है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने विधानसभा में कहा है कि इन घटनाओं पर डेटा एकत्र किया जा रहा है और शांति बनाए रखने की अपील की गई है। वहीं, भाजपा विधायक अशोक मोहंती ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि मवेशी तस्करों पर हमले केवल जनता के आक्रोश का प्रतिबिंब हैं।

बीजू जनता दल और कांग्रेस ने इसे जंगल राज करार दिया है। राज्यसभा सांसद सुलता देव का आरोप है कि सत्ता में बैठे कुछ लोगों द्वारा इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ईसाई और मुस्लिम संगठनों ने पुलिस की निष्क्रियता को इन हमलों की मुख्य वजह बताया है और मांग की है कि भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2018 के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए।