ब्रिटिश सरकार अपने ही देश में आलोचनाओँ का शिकार
लंदनः ब्रिटेन की राजधानी लंदन के ऐतिहासिक हृदय स्थल में चीन को एक विशालकाय सुपर एम्बेसी बनाने की अनुमति देने के ब्रिटिश सरकार के हालिया निर्णय ने पिछले 8 घंटों के भीतर संयुक्त राज्य और यूरोप की राजनीति में एक जबरदस्त भूचाल ला दिया है।
यह विवाद केवल एक इमारत के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने यूनाइटेड किंगडम की राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और चीन के साथ उसके भविष्य के संबंधों पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। पिछले कुछ घंटों में ब्रिटिश संसद (वेस्टमिंस्टर) के भीतर विपक्षी लेबर और कंजर्वेटिव दोनों दलों के कई वरिष्ठ सांसदों ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ किया गया एक अक्षम्य समझौता करार दिया है।
यह प्रस्तावित दूतावास लंदन के सबसे प्रतिष्ठित स्थलों में से एक, ‘टावर ऑफ लंदन’ के ठीक सामने स्थित रॉयल मिंट कोर्ट की ऐतिहासिक भूमि पर बनेगा। लगभग 700,000 वर्ग फुट में फैली यह संरचना न केवल लंदन में, बल्कि पूरे यूरोप में चीन का सबसे बड़ा कूटनीतिक मिशन होगी।
सुरक्षा विशेषज्ञों और विपक्ष के कट्टर विरोधियों का मुख्य तर्क यह है कि लंदन के वित्तीय जिले और प्रमुख सरकारी कार्यालयों के इतने करीब चीन का इतना विशाल आधार होना जासूसी के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। उन्हें डर है कि इस परिसर का उपयोग उन्नत तकनीकी निगरानी, सिग्नल इंटेलिजेंस और साइबर जासूसी के लिए किया जा सकता है, जो ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी के लिए एक स्थायी सिरदर्द बन सकता है।
दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार और विदेश कार्यालय ने इस फैसले का बचाव करते हुए एक कूटनीतिक तर्क पेश किया है। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रोटोकॉल और वियना कन्वेंशन के तहत किसी भी संप्रभु देश को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार दूतावास बनाने का अधिकार है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अनुमति एक पारस्परिक समझौते का हिस्सा है, ताकि बीजिंग में स्थित ब्रिटिश दूतावास को भी इसी तरह की विस्तारित सुविधाएं और सुरक्षा मिल सके। सरकार का मानना है कि चीन के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखने के लिए इस तरह के कदम उठाना आवश्यक है, भले ही सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रहें।
हालांकि, स्थानीय स्तर पर विरोध की लहर और भी तेज हो गई है। लंदन के मेयर और टावर हैमलेट्स काउंसिल के स्थानीय निवासियों ने इस परियोजना के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। निवासियों को डर है कि इस सुपर एम्बेसी के कारण क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान नष्ट हो जाएगी और सुरक्षा के नाम पर स्थानीय लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
चीन ने इन सभी चिंताओं को निराधार और शीत युद्ध की मानसिकता से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया है। बीजिंग का दावा है कि यह नया परिसर केवल बढ़ते कूटनीतिक कार्यों और कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था के लिए है।
वर्तमान में यह मुद्दा ब्रिटेन के भीतर चीन के प्रति बढ़ते अविश्वास और आर्थिक लाभ बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की जटिल बहस का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले हफ्तों में और उग्र हो सकता है, जिससे न केवल लंदन की स्थानीय राजनीति प्रभावित होगी, बल्कि ब्रिटेन और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में भी कड़वाहट आ सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिटिश सरकार सुरक्षा चिंताओं और कूटनीतिक वादों के बीच किस प्रकार संतुलन बनाती है।