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रूस का त्रिपक्षीय संवाद पर फिर से ज़ोर

बदलते वैश्विक समीकरणों से बीच नया समीकरण उभरा

मॉस्कोः रूस, भारत और चीन (आरआईसी) के त्रिपक्षीय गठबंधन को पुनर्जीवित करने की रूस की हालिया पहल वैश्विक भू-राजनीति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम मानी जा रही है। मॉस्को में 20 जनवरी 2026 को आयोजित अपनी वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस बात पर जोर दिया कि यूरेशिया की स्थिरता और एक न्यायसंगत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए इन तीनों महाशक्तियों का एक साथ आना अनिवार्य हो गया है। लावरोव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यवस्था एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है और पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका की व्यापारिक एवं सैन्य नीतियां अन्य देशों के लिए चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

रूस का मानना है कि आरआईसी केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं है, बल्कि यह ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे बड़े संगठनों की नींव है। रूस की इस पहल के पीछे मुख्य उद्देश्य पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय और सुरक्षा संस्थानों के विकल्प तैयार करना है। लावरोव ने अपने संबोधन में एक वैकल्पिक भुगतान प्रणाली के विकास पर विशेष बल दिया, जो अमेरिकी डॉलर और स्विफ्ट जैसी प्रणालियों पर निर्भरता को कम कर सके। रूस चाहता है कि तीनों देश अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दें और एक ऐसा साझा सुरक्षा ढांचा विकसित करें जो बाहरी हस्तक्षेप के बिना यूरेशिया की रक्षा कर सके।

हालांकि, इस त्रिपक्षीय ढांचे को पुनर्जीवित करने की राह में सबसे बड़ी बाधा भारत और चीन के बीच का गहरा अविश्वास और ऐतिहासिक सीमा विवाद है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से आरआईसी की गतिविधियां लगभग ठप रही हैं। यद्यपि 2025 के अंत तक सीमा पर तनाव कम करने की दिशा में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन भारत के लिए संतुलन बनाना अभी भी एक कठिन चुनौती है।

भारत एक तरफ रूस के साथ अपने विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने बढ़ते रक्षा और तकनीकी सहयोग को भी खतरे में नहीं डालना चाहता। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति उसे किसी भी ऐसे गुट में शामिल होने से रोकती है जो सीधे तौर पर पश्चिम के खिलाफ हो।

चीन ने रूस के इस प्रस्ताव का सकारात्मक स्वागत किया है, क्योंकि वह भी अमेरिकी टैरिफ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी घेराबंदी से निपटने के लिए सहयोगियों की तलाश में है। इसके विपरीत, भारत ने फिलहाल प्रतीक्षा करो और देखो की नीति अपनाई है। नई दिल्ली का मानना है कि जब तक चीन के साथ सीमा पर पूर्ण शांति और यथास्थिति बहाल नहीं होती, तब तक रणनीतिक स्तर पर पूर्ण सहयोग संभव नहीं है। फिर भी, यह खबर वैश्विक कूटनीति में एक नए ‘एशियन ब्लॉक’ की सुगबुगाहट को तेज कर रही है। यदि ये तीनों देश एक साझा मंच पर आते हैं, तो वे दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी और लगभग 25 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिनिधित्व करेंगे, जो भविष्य में जी-7 जैसे संगठनों के आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को गंभीर चुनौती दे सकता है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव द्वारा भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय वार्ता को फिर से शुरू करने के आह्वान और इसके पीछे की भू-राजनीतिक मंशा को समझने में मदद करता है।