शंकराचार्य का नंबर आ गया आपलोगों का भी आयेगा
माघ मेले के पावन अवसर पर मौनी अमावस्या के दिन संगम तट से जो तस्वीरें और समाचार सामने आए, वे न केवल विचलित करने वाले हैं बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का यह आरोप कि उन्हें संगम स्नान से बलपूर्वक रोका गया और उनके विरुद्ध भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर उनकी हत्या की साजिश रची गई, भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्म और शासन के बीच के बढ़ते तनाव को रेखांकित करता है।
कुंभ और माघ मेले जैसे आयोजनों में प्रशासन की पहली प्राथमिकता भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लाखों-करोड़ों की भीड़ को संभालना एक दुरूह कार्य है। लेकिन, जब बात देश के सर्वोच्च धार्मिक पदों पर आसीन विभूतियों की हो, तो वहां प्रोटोकॉल और संवेदनशीलता का संतुलन अनिवार्य हो जाता है।
शंकराचार्य का यह आरोप कि उनकी पालकी को बैरिकेड्स लगाकर रोका गया और उनके समर्थकों के साथ पुलिस की हाथापाई हुई, यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं मैनेजमेंट और संवाद में भारी चूक हुई है। शंकराचार्य का यह दावा कि कुछ पुलिसकर्मी वर्दी में नहीं थे और उन्होंने अभद्र व्यवहार किया, सुरक्षा मानकों के उल्लंघन का एक गंभीर पहलू है।
सादे कपड़ों में सुरक्षाकर्मी तैनात करना एक रणनीति हो सकती है, लेकिन जब वे किसी धार्मिक गुरु के घेरे में प्रवेश करते हैं, तो उनकी पहचान और व्यवहार का पारदर्शी होना आवश्यक है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा लगाया गया हत्या की साजिश का आरोप केवल एक भावुक प्रतिक्रिया नहीं मानी जा सकती।
यदि एक शीर्ष धर्मगुरु को अपनी सुरक्षा को लेकर इतना असुरक्षित महसूस करना पड़ा कि उन्हें आमरण अनशन जैसा कठोर कदम उठाना पड़े, तो यह गृह प्रशासन की विफलता का संकेत है। प्रशासन का तर्क हो सकता है कि भीड़ अधिक होने के कारण सुरक्षा कारणों से मार्ग बदला गया या रोका गया, लेकिन क्या यह जानकारी शंकराचार्य के शिविर तक समय रहते नहीं पहुंचाई जा सकती थी?
अक्सर देखा गया है कि धार्मिक आयोजनों में वीआईपी मूवमेंट और आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा के बीच सामंजस्य बिठाने में स्थानीय प्रशासन विफल रहता है। लेकिन शंकराचार्य जैसे व्यक्तित्व के साथ हुआ यह व्यवहार केवल कुप्रबंधन है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक या प्रशासनिक रंजिश, यह जांच का विषय है।
शंकराचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि वे तब तक स्नान नहीं करेंगे और अनशन पर रहेंगे जब तक कि दोषी अधिकारी उन्हें ससम्मान संगम तक नहीं ले जाते। यह मांग केवल एक व्यक्ति की जिद नहीं, बल्कि उस पद की गरिमा की रक्षा का प्रश्न है जिसे वे धारण करते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध प्रकट करने का यह तरीका (अनशन) प्रशासन को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है। इस विवाद ने मौनी अमावस्या के पुण्य अवसर पर एक कड़वाहट घोल दी है।
सरकार और उच्च अधिकारियों को चाहिए कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और संवाद के माध्यम से गतिरोध को समाप्त करें। पुलिस और प्रशासन को यह समझना होगा कि वे समाज के सेवक हैं, शासक नहीं। धर्म और अध्यात्म के केंद्र प्रयागराज में यदि संतों को ही अपमानित होना पड़े, तो यह उस तीर्थ की मर्यादा के भी विरुद्ध है। प्रशासनिक दक्षता तभी सार्थक है जब वह सम्मानजनक हो। सुरक्षा के नाम पर गरिमा का हनन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
इस घटना की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी बड़े आयोजन में आस्था और व्यवस्था के बीच ऐसा हिंसक और अपमानजनक टकराव न हो। शंकराचार्य की सुरक्षा और उनके सम्मान की बहाली ही इस समय का सबसे उचित समाधान है। इधर विवाद बढ़ते ही सोशल मीडिया में एक वर्ग शंकराचार्य के खिलाफ विष वमन करने में जुट गया और यह बताया जाने लगा है कि दरअसल वह शंकराचार्य ही नहीं है।
दरअसल यह वह वर्ग है, जिसे नरेंद्र मोदी ही असली हिंदू नजर आते हैं और उनका विरोध करने वाला हर व्यक्ति धर्म विरोधी है। यह सवाल अब पूरे देश के सामने आ चुका है कि इस किस्म की धक्कामुक्की और अपमान का निहितार्थ क्या है। क्या योगी आदित्यनाथ भाजपा की आंतरिक राजनीति में दिल्ली दरबार को उलझा रहे हैं। वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि मोदी समर्थकों के लिए वही असली हिंदू है जो आंख बंद कर मोदी की हर बात का समर्थन करें। वरना सोशल मीडिया के ये सारे वीर तुरंत ही सक्रिय हो जाते हैं। मजेदार बात यह है कि इन तमाम लोगों की सारी कुंडली लेकर ममता बनर्जी पहले से ही तैयार बैठी हुई हैं।