सॉलिड स्टेट बैटरियों की गुणवत्ता और कार्यकुशलता बढ़ेगी
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दरारों की चुनौती और सिल्वर का समाधान
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बताया कि कैसे काम करती है यह तकनीक
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अभी इसे व्यापक तौर पर जांचना शेष है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः बैटरी के भीतर लिक्विड (तरल) इलेक्ट्रोलाइट के बजाय सॉलिड (ठोस) इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग करना भविष्य की ऊर्जा तकनीक की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। यह न केवल वर्तमान लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में अधिक सुरक्षित है, बल्कि इसमें अधिक ऊर्जा संचय करने और बहुत तेज़ी से चार्ज होने की क्षमता भी होती है। हालांकि, दशकों से वैज्ञानिक एक बड़ी चुनौती से जूझ रहे थे—ठोस इलेक्ट्रोलाइट्स में आने वाली सूक्ष्म दरारें । अब स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने सिल्वर (चांदी) की मदद से इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया है।
सॉलिड-स्टेट बैटरियों में इस्तेमाल होने वाला सिरेमिक आधारित इलेक्ट्रोलाइट काफी भंगुर होता है। बार-बार चार्जिंग और डिस्चार्जिंग के दौरान इसमें नन्ही दरारें पैदा हो जाती हैं, जो समय के साथ बढ़कर बैटरी को पूरी तरह खराब कर देती हैं। स्टैनफोर्ड की टीम ने पाया कि इलेक्ट्रोलाइट की सतह पर चांदी की एक अत्यंत पतली परत (मात्र 3 नैनोमीटर) चढ़ाकर और उसे 300 डिग्री सेल्सियस पर हीट-ट्रीट करके इस टूट-फूट को रोका जा सकता है। इस प्रक्रिया से तैयार सतह दबाव झेलने में सामान्य सतह से पांच गुना अधिक सक्षम पाई गई। यह कोटिंग लिथियम को मौजूदा दरारों में घुसने से भी रोकती है, जिससे फास्ट चार्जिंग के दौरान होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है।
शोधकर्ताओं ने एलएलजेडओ (लिथियम, लैंथेनम, जिरकोनियम और ऑक्सीजन) नामक ठोस इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग किया। अन्य शोधों के विपरीत, स्टैनफोर्ड की टीम ने धातुई चांदी के बजाय चांदी के आयन का उपयोग किया। गर्म करने पर ये चांदी के परमाणु इलेक्ट्रोलाइट की सतह में प्रवेश कर जाते हैं और छोटे लिथियम परमाणुओं की जगह ले लेते हैं।
यह नैनोस्केल सिल्वर डोपिंग इलेक्ट्रोलाइट की संरचना को मौलिक रूप से बदल देती है। चांदी के आयन सिरेमिक को मजबूती प्रदान करते हैं और दरारों को फैलने से रोकते हैं। यह तकनीक न केवल लिथियम बैटरियों, बल्कि सोडियम आधारित बैटरियों के लिए भी उम्मीद की किरण जगाती है, जो भविष्य में लिथियम की कमी को दूर कर सकती हैं।
हालांकि यह शोध एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी इसे पूरी बैटरी सेल के स्तर पर और बड़े पैमाने पर परखा जाना बाकी है। टीम अब यह देख रही है कि क्या यह तकनीक हजारों चार्जिंग साइकिल तक टिकी रह सकती है। चांदी के अलावा तांबे जैसे अन्य धातुओं पर भी परीक्षण किए जा रहे हैं, ताकि लागत और प्रभावशीलता का सही संतुलन बनाया जा सके।
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