पेरोव्स्काइट और सिलिकॉन हाइब्रिड सेल्स तैयार हुए
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इसके काम करने का तरीका समझिए
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कार्यक्षमता में 34 प्रतिशत बढ़ोत्तरी
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प्रदूषण की समस्या भी कम होगी
राष्ट्रीय खबर
रांचीः पिछले कई दशकों से सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सिलिकॉन का दबदबा रहा है। हम अपने घरों की छतों पर जो नीले या काले रंग के सोलर पैनल देखते हैं, वे मुख्य रूप से सिलिकॉन से बने होते हैं। लेकिन सिलिकॉन की एक सीमा है; यह सूर्य के प्रकाश को बिजली में बदलने की एक अधिकतम क्षमता तक पहुँच चुका है। ऐसे में, जनवरी 2026 में विज्ञान जगत से एक बड़ी खबर आई है कि वैज्ञानिकों ने पेरोव्स्काइट नामक एक नए पदार्थ और सिलिकॉन को मिलाकर एक टैंडम सोलर सेल तैयार किया है, जिसने ऊर्जा उत्पादन के पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
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पेरोव्स्काइट एक विशेष क्रिस्टल संरचना वाला पदार्थ है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सूर्य के प्रकाश के उन रंगों को भी सोख सकता है जिन्हें साधारण सिलिकॉन सेल्स नहीं सोख पाते। जब इन दोनों को एक साथ मिलाया जाता है, तो यह हाइब्रिड सेल सूर्य की रोशनी के हर हिस्से का बेहतर इस्तेमाल करता है। हालिया शोधों के अनुसार, इन नए सेल्स की कार्यक्षमता 34 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है। सरल भाषा में कहें तो, अब उतने ही बड़े पैनल से हम पहले के मुकाबले लगभग 40-50 फीसद अधिक बिजली पैदा कर पाएंगे।
इस तकनीक के व्यापक स्तर पर आने से ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। शहरों में जहाँ छतों पर जगह कम होती है, वहां ये उच्च क्षमता वाले पैनल वरदान साबित होंगे। कारों की छतों पर इन सेल्स को लगाकर चलते-फिरते चार्जिंग की क्षमता को बढ़ाया जा सकेगा। अब कार की छत से इतनी बिजली पैदा होगी कि वह ड्राइविंग रेंज को काफी हद तक बढ़ा सकेगी। पेरोव्स्काइट को पतला और लचीला बनाया जा सकता है। भविष्य में आपकी खिड़कियों के कांच भी सोलर पैनल की तरह काम कर सकेंगे।
हालाँकि अभी पेरोव्स्काइट की टिकाऊपन पर काम चल रहा है, लेकिन इसका निर्माण सिलिकॉन के मुकाबले काफी सस्ता है, जिससे बिजली की दरें और कम हो सकती हैं। 2026 की यह वैज्ञानिक उपलब्धि न केवल कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगी, बल्कि दुनिया को नेट जीरो लक्ष्यों की ओर तेजी से ले जाएगी।
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