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चुनाव आयुक्तों को ऐसी सुरक्षा किसके फायदे में

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में चुनाव मात्र एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय उत्सव और लोकतांत्रिक शुचिता का प्रमाण हैं। इस महाकुंभ को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संपन्न कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग के कंधों पर होती है। हाल के वर्षों में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति और उन्हें प्राप्त आजीवन सुरक्षा (संवैधानिक संरक्षण) पर व्यापक बहस छिड़ी है।

प्रश्न यह उठता है कि क्या यह सुरक्षा विशेषाधिकार है या निष्पक्षता की अनिवार्य शर्त? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद की सुरक्षा प्रदान की गई है। उन्हें उनके पद से केवल उसी प्रक्रिया और आधार पर हटाया जा सकता है, जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को यानी संसद द्वारा पारित महाभियोग।

अन्य चुनाव आयुक्तों के मामले में भी, उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता। यह सुरक्षा कवच उन्हें राजनीतिक दबाव, कार्यपालिका के हस्तक्षेप और किसी भी प्रकार के प्रतिशोध से बचाता है। जब हम कहते हैं कि देश में किसी और को ऐसी सुरक्षा प्राप्त नहीं है, तो यह इस अर्थ में है कि भारत में केवल चुनाव आयोग और उच्च न्यायपालिका ही ऐसे संस्थान हैं जिनके शीर्ष पदों को हटाने की प्रक्रिया इतनी जटिल बनाई गई है कि सत्ताधारी दल अपनी इच्छा मात्र से उन्हें पदच्युत नहीं कर सकता।

चुनाव आयुक्तों को दी गई यह सुरक्षा कोई व्यक्तिगत उपकार नहीं, बल्कि संस्थागत आवश्यकता है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। चुनाव के दौरान आयोग को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं, जो कई बार सत्ताधारी दल या शक्तिशाली नेताओं के विरुद्ध होते हैं। यदि उनके सिर पर पद खोने की तलवार लटकी रहे, तो वे निष्पक्ष कार्य नहीं कर पाएंगे।

लोकतंत्र के तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग का कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त होना अनिवार्य है। भारत की चुनावी प्रक्रिया को वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है। इसका मुख्य कारण निर्वाचन आयोग की वह शक्ति है, जो उसे संविधान से प्राप्त है। निश्चित रूप से। देश के कैबिनेट सचिव, सेना प्रमुख या पुलिस महानिदेशकों जैसे उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों को ऐसी संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है।

उन्हें सरकार एक प्रशासनिक आदेश के जरिए हटा या स्थानांतरित कर सकती है। चुनाव आयुक्तों को इस श्रेणी से बाहर रखना यह दर्शाता है कि संविधान निर्माताओं ने चुनावी शुचिता को राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासन के समान ही, या शायद उससे भी अधिक महत्व दिया था। पिछले कुछ वर्षों में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद रहे हैं। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने इस सुरक्षा को और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।

न्यायालय का मानना था कि एक चुनाव आयुक्त को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। हालांकि, बहस का एक पहलू यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बीच सुरक्षा के स्तर में थोड़ा अंतर है। विशेषज्ञों का तर्क है कि लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए तीनों आयुक्तों को समान रूप से महाभियोग जैसी सुरक्षा मिलनी चाहिए, ताकि पूरी संस्था एक इकाई के रूप में अभेद्य बनी रहे।

चुनाव आयुक्तों को प्राप्त यह विशेष कानूनी सुरक्षा लोकतंत्र का बीमा है। यह सुनिश्चित करती है कि भारत का मतदाता जब अपना वोट डालने जाए, तो उसे इस बात का भरोसा हो कि पूरी प्रक्रिया किसी राजनैतिक दल के प्रभाव में नहीं, बल्कि संविधान के पहरेदारों की निगरानी में हो रही है। यद्यपि किसी भी अन्य पद को ऐसी सुरक्षा प्राप्त नहीं है, लेकिन इसका कारण यह है कि किसी भी अन्य पद की विफलता केवल एक विभाग को प्रभावित करती है, जबकि चुनाव आयोग की विफलता पूरे लोकतंत्र को ध्वस्त कर सकती है।

वर्तमान में चुनाव आयोग के फैसले यह दर्शाते हैं कि सारे निर्णय़ सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए लिये गये है। एसआईआर के खेल को भी अब समझा जा चुका है। वोट चोरी के मामले में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आरोपों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया है।

दूसरी तरफ हर बार जब चुनाव आयोग पर हमला होता है तो बचाव के लिए भाजपा के नेता सामने आ जाते हैं जबकि चुनाव आयोगों की दलीलों से उसका और मजाक बन जाता है। मसलन वीडियो क्लिप उपलब्ध नहीं कराने पर ज्ञानेश गुप्ता के बयान का मजाक बन गया है। वर्तमान में आजीवन सुरक्षा का नियम शायद किसी नई सरकार के आने तक ही कारगर रहेगा। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है कि इस आजीवन सुरक्षा प्रदान करने कै नैतिक औचित्य क्या है और इस फैसले से आखिरकार लाभ किसे हो रहा है।