दूसरे देश पर कब्जा साम्राज्य वादी सोच है
बीजिंग: आर्कटिक क्षेत्र में स्थित विशाल द्वीप ग्रिनलैंड को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। बीजिंग ने ग्रिनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की कोशिशों को साम्राज्यवादी सोच करार देते हुए कड़ी आलोचना की है। चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन को अपने विस्तारवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए अन्य देशों को ‘बहाना’ या ‘ढाल’ के रूप में इस्तेमाल करना बंद कर देना चाहिए। चीन का दावा है कि आर्कটিক क्षेत्र में उसकी सभी गतिविधियाँ पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में हैं।
सोमवार को बीजिंग में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि आर्कटिक में शांति, स्थिरता और सतत विकास ही चीन का मुख्य लक्ष्य है। उन्होंने जोर देकर कहा, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों को आर्कटिक क्षेत्र में शोध और विकास करने का अधिकार है और इस अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। अमेरिका को अपनी रणनीतिक भूख मिटाने के लिए दूसरे देशों पर झूठे आरोप नहीं मढ़ने चाहिए।
यह विवाद तब और गहरा गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार यह तर्क दिया कि यदि ग्रिनलैंड अमेरिका के नियंत्रण में नहीं आया, तो रूस या चीन वहां अपना आधार बना लेंगे। ट्रंप ने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए यहाँ तक कह दिया कि वे ग्रिनलैंड के लिए सौदा करना चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ी तो वे अन्य रास्ते (सैन्य विकल्प) अपनाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। ट्रंप के इस रुख ने डेनमार्क, वाशिंगटन और ग्रिनलैंड के बीच राजनयिक तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका जबरन ग्रिनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करता है, तो यह नाटो के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देगा। वहीं ग्रिनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेड्रिक नीलसन ने दो टूक कहा है कि उनके भविष्य का फैसला केवल वहां की जनता करेगी। गौरतलब है कि चीन ने 2018 में खुद को नियर-आर्कटिक राष्ट्र घोषित किया था और वह पोलर सिल्क रोड बनाने की योजना पर काम कर रहा है। वर्तमान में, डेनमार्क और ग्रिनलैंड के प्रतिनिधियों के वाशिंगटन दौरे की संभावना है, जिससे इस अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकट के और उलझने के आसार हैं।