Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
पीएम मोदी के 'दिमागी नक्सल' बयान पर किरेन रिजिजू का विपक्ष पर तीखा पलटवार रामपुरहाट टीएमसी दफ्तर में फंदे से लटके मिले पूर्व डिप्टी स्पीकर आशीष बनर्जी: सुसाइड नोट में मानसिक ... 'बिहार बन रहा पेपर लीक की राजधानी': तेजस्वी यादव का NDA सरकार पर तीखा हमला, 19 अगस्त को राजभवन मार्च... पीएम मोदी के 'दिमागी नक्सल' बयान पर BJP-कांग्रेस आमने-सामने, छिड़ा सियासी घमासान बरेली: सरकारी नौकरी का झांसा देकर रचाई शादी, विरोध पर बेल्ट से पीटा और छीने जेवर; पति समेत ससुराल वा... सुखबीर बादल पर हमले की NIA जांच की मांग: हरसिमरत कौर बादल ने गृह मंत्री अमित शाह को लिखा पत्र, बड़ी ... भिवंडी: दरगाह में इलाज के नाम पर महिला से अघोरी रस्में व प्रताड़ना; UP भागने की फिराक में था मौलवी, ... दिल्ली में पूरा हुआ 100 'अटल कैंटीन' का संकल्प: DU मेट्रो स्टेशन से 25 नई कैंटीन शुरू, मात्र ₹5 में ... रीवा में स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही: 2 घंटे तक नहीं पहुंची 108 एंबुलेंस, सांस लेने में तकलीफ से जूझ... खान-खनिज संशोधन बिल के खिलाफ रांची में राजद-वाम दलों का साझा मोर्चा: आर्थिक नाकेबंदी और दिल्ली घेराव...

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम दमनकारी कानून

हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करने का निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। ये दोनों आरोपी पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं।

हालांकि न्यायालय ने उनके साथ गिरफ्तार किए गए पांच अन्य लोगों की रिहाई का आदेश दिया, लेकिन खालिद और इमाम को कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की बेड़ियों में ही रहने दिया गया। यूएपीए एक ऐसा कानून है जिसके प्रावधान अक्सर लोकतंत्र की भावना और बेहतरीन मानदंडों का उल्लंघन करते प्रतीत होते हैं।

न्यायालय ने यूएपीए की धारा 43डी(5) का हवाला देते हुए कहा कि जब अभियोजन पक्ष की सामग्री को प्रथम दृष्टया सही माना जाए, तो जमानत पर वैधानिक प्रतिबंध लागू होंगे। अदालत का यह तर्क कि खालिद और इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से भिन्न आधार पर खड़े हैं, न केवल निराशाजनक है, बल्कि चिंताजनक भी है।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ऐतिहासिक रूप से राज्य की पूर्वाग्रहपूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के विरुद्ध नागरिक की रक्षा करने और संविधान द्वारा प्रदत्त बुनियादी स्वतंत्रताओं का प्रहरी रहा है। किंतु इस निर्णय ने उन तमाम सिद्धांतों को कमजोर कर दिया है जिन्हें स्वयं इसी न्यायालय ने अतीत में दिशा-निर्देशों के रूप में निर्धारित किया था।

इस निर्णय का सबसे विवादास्पद पहलू सहभागिता का पदानुक्रम है। न्यायालय ने चयनात्मक जमानत देने के लिए एक संदिग्ध अंतर पैदा किया है, जो जमानत से इनकार करने का एक नया और खतरनाक आधार बन सकता है। अतीत में न्यायालय ने स्वयं व्यवस्था दी है कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी, यदि शीघ्र सुनवाई की संभावना न हो, तो आरोपी को जमानत का अधिकार है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ अभी तक आरोप भी तय नहीं किए गए हैं। इस मामले में लगभग 700 गवाह हैं, जिसका अर्थ है कि सुनवाई का लंबा खिंचना तय है। न्यायालय ने स्वीकार किया कि उनकी प्री-ट्रायल कैद काफी लंबी थी, लेकिन यह भी कहा कि यह अभी तक संवैधानिक अक्षमता की दहलीज को पार नहीं कर पाई है।

अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी एक वर्ष की अवधि बीतने के बाद पुनः जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि इस दहलीज को पार करने के लिए एक वर्ष का ही समय क्यों निर्धारित किया गया? क्या इसका कोई कानूनी या संवैधानिक आधार है? न्यायालय का यह रुख कि मुकदमे में देरी आरोपी के लिए तुरुप का पत्ता नहीं है, केवल राज्य को लाभ पहुँचाता है।

इसका सीधा अर्थ है कि यदि राज्य जानबूझकर मुकदमे में देरी करता है, तो आरोपी को कानून के लाभ से वंचित रखा जा सकता है। इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि इस निर्णय ने आतंकवाद की परिभाषा का विस्तार कर दिया है। निर्णय में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 15 की व्याख्या केवल प्रत्यक्ष हिंसा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इसमें ऐसी गतिविधियां भी शामिल होंगी जो सेवाओं को बाधित करती हैं और अर्थव्यवस्था को खतरे में डालती हैं।

इस व्याख्या के अनुसार, अब आर्थिक आपूर्ति या आवश्यक सेवाओं को बाधित करना भी आतंकवादी कृत्य की श्रेणी में आ सकता है, भले ही उसमें तत्काल कोई शारीरिक हिंसा न हुई हो। यह एक खतरनाक व्याख्या है जो कानून के मूल पाठ से परे जाती है। सरकार इस व्याख्या का उपयोग किसी भी विरोध प्रदर्शन या लोकतांत्रिक आंदोलन को आतंकवाद करार देने के लिए कर सकती है।

यह निष्कर्ष अदालती सबूतों के बजाय अभियोजन के उन दावों पर आधारित है जिनमें व्हाट्सएप ग्रुपों और विरोध नेटवर्कों को साजिश का केंद्र बताया गया है। इस तरह के साक्ष्य स्वाभाविक रूप से कमजोर होते हैं और न्यायिक निर्णयों का आधार नहीं होने चाहिए। लोकतांत्रिक अधिकारों के संदर्भ में यह कानून का उपहास ही होगा यदि भाषणों और चक्का जाम जैसी गतिविधियों को आतंकवाद विरोधी कानून के दायरे में लाया जाए।

यह निर्णय लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई योग्य मानता है। यूएपीए देश के सबसे अधिक दुरुपयोग होने वाले कानूनों में से एक है, और ऐसी स्थिति में न्यायपालिका का यह रुख नागरिक अधिकारों के बजाय सत्ता के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत होता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय ही कानून बन जाते हैं, और यह निर्णय एक दमनकारी कानून को और अधिक शक्तिशाली बनाता है, जो स्वतंत्रता और लोकतंत्र के न्यायशास्त्र को पीछे ले जाता है। उम्मीद है कि भविष्य में इस पर पुनर्विचार किया जाएगा ताकि नागरिकों का भरोसा न्याय प्रणाली पर बना रहे। यह देश के असली हालात को स्पष्ट करने का जीता जागता नमूना है।