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अमेरिका के भूले बिसरे घरों की अजीब दास्तां

एक फोटोग्राफर ने कैमरे की नजरों से देखा दृश्यों को

न्यूयार्क: न्यूयॉर्क के विख्यात फोटोग्राफर ब्रायन सैंसिवेरो ने पिछले दस वर्षों का समय अमेरिका के उन एकांत और जीर्ण-शीर्ण हिस्सों को खोजने में समर्पित कर दिया है, जिन्हें दुनिया ने लगभग भुला दिया है। उनकी हालिया प्रकाशित पुस्तक, “अमेरिका द एबंडन: कैप्टिवेटिंग पोर्ट्रेट्स ऑफ डेजर्टेड होम्स”, उन आलीशान इमारतों और साधारण घरों का एक मार्मिक संकलन है, जो कभी परिवारों की खुशियों से गुलजार थे, लेकिन आज केवल इतिहास के मूक गवाह बनकर खड़े हैं। सैंसिवेरो की यह कला केवल फोटोग्राफी नहीं, बल्कि बीते हुए समय को फिर से जीने की एक कोशिश है।

सैंसिवेरो के लेंस ने अमेरिका के कोने-कोने में बिखरीं विक्टोरियन शैली की इमारतों, भव्य फार्महाउसों और बागानों के बीच बने बड़े बंगलों को कैद किया है। इन घरों की सबसे हृदयविदारक विशेषता यह है कि इनमें से कई घर कभी पूरी तरह खाली ही नहीं किए गए। उनकी तस्वीरों में दिखता है कि धूल से भरी मेजों पर आज भी आधे भरे हुए शराब के गिलास रखे हैं, अलमारियों में पुरानी किताबें और निजी पत्र मौजूद हैं, और बच्चों के कमरों में उनके खिलौने उसी तरह बिखरे पड़े हैं जैसे वे दशकों पहले छोड़े गए थे। धूल फांकते ग्रैंड पियानो और दीवारों पर लटकी धुंधली तस्वीरें एक ऐसी जिंदगी का एहसास कराती हैं, जो अचानक किसी मोड़ पर रुक गई हो।

आज के डिजिटल युग में, जहाँ अर्बन एक्सप्लोरेशन सोशल मीडिया पर केवल लाइक्स बटोरने का एक प्रतिस्पर्धी जरिया बन गया है, ब्रायन ने एक अलग और धीमी राह चुनी है। वे अपनी कला की शुद्धता बनाए रखने के लिए आधुनिक डिजिटल कैमरों के बजाय मीडियम-फॉर्मेट फिल्म और पुराने पारंपरिक उपकरणों का उपयोग करते हैं। उनका मानना है कि फिल्म पर खींची गई तस्वीरें उन जर्जर दीवारों और टूटती छतों की बनावट और उनकी रूह को बेहतर तरीके से बयां करती हैं। उनके लिए ये घर केवल ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं, बल्कि टाइम कैप्सूल हैं।

अपनी खोज के दौरान सैंसिवेरो को कई विशिष्ट हस्तियों के पुराने निवास भी मिले हैं। इनमें स्थानीय कद्दावर राजनेताओं, प्रसिद्ध फैशन डिजाइनरों और यहाँ तक कि पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखकों के घर भी शामिल हैं। वे इन घरों के इतिहास पर गहरा शोध करते हैं, लेकिन अपनी पुस्तक में वे उनके निवासियों की पहचान को अक्सर गुप्त रखते हैं ताकि उनकी त्रासदी का तमाशा न बने। वे जानना चाहते हैं कि आखिर इन संपन्न घरों को इस हाल में क्यों छोड़ दिया गया—क्या यह आर्थिक मंदी थी, कोई पारिवारिक त्रासदी या समय का निष्ठुर पहिया? उनकी तस्वीरें दर्शकों को एक ऐसे संसार में ले जाती हैं जहाँ प्रकृति धीरे-धीरे मानव निर्मित कलाकृतियों पर अपना अधिकार फिर से जमा रही है।