जमशेदपुरः लौहनगरी जमशेदपुर में ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन द्वारा ओलचिकी लिपि के क्षेत्र में काम करने वाले साहित्यकारों को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया.
राष्ट्रपति से सम्मान पाने वालों में ओलचिकी लिपि की रचना करने वाले पंडित रघुनाथ मुर्मू के पोते बी. मुर्मू को सम्मानित किया गया. बी. मुर्मू ने ईटीवी भारत से खास बातचीत की. साथ ही इस खुशी के पलों को साझा किया.
जमशेदपुर में ऑल इंडिया संथाली राइटर्स एसोसिएशन द्वारा ओल ओलचिकी के शताब्दी वर्ष पूरा होने पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इसके समापन समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं. राष्ट्रपति ने ओलचिकि लिपि के क्षेत्र मे काम करने वाले साहित्यकारों सम्मानित किया.
बता दें कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओलचिकी लिपि की रचना की है. 1925 में उन्होंने इस भाषा को एक नई पहचान देने के लिए इसकी नींव रखी थी. ओलचिकि लिपि की रचना के शुरुआत होते ही आदिवासी संथाली समाज के कई युवा पीढ़ी इससे जुड़ गई और इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया.
25 दिसंबर 2025 को ओलचिकी लिपि के 100 साल पूरा होने पर भारत का संविधान भी इसी लिपि में लिखा गया. लिपि के सौ वर्ष पूरा होने पर संताली समाज शताब्दी वर्ष बना रहा है. ऑल इंडिया राइटर एसोसिएशन ओलचिकि लिपि के शताब्दी वर्ष पूरा होने पर इस लिपि के सफलता के लिए अभियान में शामिल लोगों को सम्मानित करने का काम भी किया.
ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 12 लोगों को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया. सम्मान पाने वाले के चेहरे पर खुशी नजर आई, उन्हें यकीन ही नहीं था कि राष्ट्रपति के हाथों उन्हें सम्मान मिलेगा और उनसे मिलने का मौका भी मिलेगा.
ओलचिकि लिपि की रचना करने वाले पंडित रघुनाथ मुर्मू के बड़े पुत्र के बेटे बी. मुर्मू को भी सम्मान मिला. उन्होंने ईटीवी भारत से बातचीत करने के दौरान अपनी खुशी जाहिर की. उन्होंने कहा कि आज उनके दादा के अथक प्रयास से इस भाषा को एक पहचान मिली है और देश का संविधान भी इस भाषा में अनुवादित भी किया गया है जो हमारे लिए गर्व की बात है.
आगे उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्रीय भाषा में काम करने वालों को जो सुविधा मिलनी चाहिए वह एक चुनौती है. झारखंड सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि अब तक लाखों बच्चों को उनके द्वारा ओलचिकि लिपि भाषा का ज्ञान दिया जा चुका है. वह इस प्रयास को आगे भी निरंतर जारी रखेंगे, आज का दिन न सिर्फ हमारे लिए बल्कि हमारे समाज के लिए भी बहुत गर्व की बात है.
वहीं ओलचिकि लिपि के लिए काम करने वाले साहित्यकार बापी टुडू ने बताया कि आज हमें अपनी भाषा संस्कृति पर गर्व है. हम कभी सोचे नहीं थे कि राष्ट्रपति से मिलेंगे और मैं उनसे मिला और सम्मान पाकर गर्व महसूस हो रहा है.