उत्तर प्रदेश सरकार की पहल पर अदालत ने रोक लगायी
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित एक जिला अदालत ने 2015 के चर्चित मोहम्मद अखलाक लिंचिंग मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने सरकार द्वारा अभियुक्तों के खिलाफ मामले को वापस लेने की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। अभियोजन पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत यह आवेदन दायर किया था, जिस पर 22 और 23 दिसंबर 2025 को गहन सुनवाई हुई। न्यायाधीश ने याचिका को निराधार और महत्वहीन करार देते हुए न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आवेदन में मुकदमा वापस लेने के लिए कोई भी ऐसा कानूनी तर्क नहीं दिया गया जो न्याय के हित में हो। यह मामला 28 सितंबर 2015 की रात का है, जब उत्तर प्रदेश के दादरी के पास बिसाहड़ा गांव में एक भीड़ ने मोहम्मद अखलाक के घर पर हमला कर दिया था। आरोप था कि परिवार ने एक बछड़े का वध किया है और उसका मांस खाया है। इस अफवाह के बाद स्थिति अनियंत्रित हो गई और भीड़ ने पीट-पीटकर अखलाक की हत्या कर दी। पुलिस ने इस मामले में हत्या, दंगा और आपराधिक धमकी सहित कई धाराओं में 19 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
अक्टूबर 2025 में, राज्य सरकार ने गवाहों के बयानों में विसंगतियों का हवाला देते हुए मुकदमे को वापस लेने के लिए निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, अखलाक के परिवार ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया। उनकी पत्नी ने राज्य सरकार के इस निर्णय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। अदालत के इस फैसले के बाद, भाजपा के स्थानीय नेता के बेटे विशाल राणा और उसके भाई शिवम राणा सहित अन्य अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा। यह मामला देश भर में भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा और सांप्रदायिक तनाव पर एक बड़ी बहस का केंद्र रहा है।