वित्तीय संकट से निकलने के लिए बड़ा विलय
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पहले भी कई बैंकों का विलय हुआ है
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रिपोर्ट में निजीकरण का उल्लेख भी है
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कई छोटे बैंक आयेंगे इसकी चपेट में
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: देश के बैंकिंग परिदृश्य को सुव्यवस्थित और सशक्त बनाने की दिशा में केंद्र सरकार एक और महत्वाकांक्षी कदम उठाने की तैयारी कर रही है। एक आंतरिक सरकारी दस्तावेज़, जिसका नाम रिकॉर्ड ऑफ डिस्कशन है, में मेगा बैंक विलय योजना के अगले चरण का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह दस्तावेज़ इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या को और कम करके उन्हें विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ की समीक्षा प्रक्रिया जल्द ही शुरू होने वाली है। इसकी जाँच पहले कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाएगी, जो इस योजना के विभिन्न पहलुओं और संभावित प्रभावों पर गहन विचार-विमर्श करेंगे। इसके पश्चात, अंतिम नीतिगत मार्गदर्शन और अनुमोदन के लिए इसे सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय में भेजा जाएगा। इस उच्च स्तरीय समीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रस्तावित विलय योजना देश की व्यापक आर्थिक और वित्तीय स्थिरता के लक्ष्यों के अनुरूप हो।
बैंकों के इस अगले चरण के विलय पर चर्चा और परामर्श वित्तीय वर्ष 2027 में शुरू होने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य है कि इसी वित्तीय वर्ष के भीतर इस महत्वाकांक्षी योजना के कार्यान्वयन के लिए एक रोडमैप को अंतिम रूप दे दिया जाए। हालांकि, इस संवेदनशील विषय पर सरकारी घोषणा से पहले आंतरिक सहमति बनाने पर जोर दिया जा रहा है। वर्तमान में, वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव की पुष्टि या खंडन करते हुए कोई आधिकारिक टिप्पणी जारी नहीं की है।
यह निर्णय सरकार के उस व्यापक और सतत प्रयास का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत और पूंजीकृत बनाना है। इस दिशा में पहले भी कई बड़े कदम उठाए गए हैं। वर्ष 2017 और 2020 के बीच, केंद्र सरकार ने 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बड़े बैंकों का निर्माण किया था, जिसके परिणामस्वरूप 2017 में 27 रहे PSBs की कुल संख्या घटकर मात्र 12 रह गई थी। उदाहरण के तौर पर, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का विलय पंजाब नेशनल बैंक में किया गया था, जबकि सिंडिकेट बैंक को केनरा बैंक के साथ मिला दिया गया था। इससे पहले भारतीय स्टेट बैंक में भी उसके सभी सहयोगी बैंकों का विलय किया जा चुका है।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रतिष्ठित नीति थिंक टैंक नीति आयोग ने पहले ही यह सुझाव दिया था कि देश को केवल कुछ ही बड़े, मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बनाए रखना चाहिए, जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और केनरा बैंक। आयोग ने बाकी बचे बैंकों को या तो विलय करने या उनका निजीकरण करने का प्रस्ताव दिया था।
मौजूदा योजना इसी सिफारिश पर आधारित मानी जा रही है। इसी के तहत, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया जैसे छोटे बैंकों को बड़े बैंकों के साथ विलय करने का निर्णय लिया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र के नाम भी संभावित विलय सूची में शामिल किए गए हैं।
बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि यह मेगा विलय योजना वर्तमान वित्तीय और डिजिटल परिदृश्य के लिए सर्वथा उपयुक्त है। आज के दौर में, फिनटेक कंपनियां और निजी क्षेत्र के बैंक तेजी से अपनी पहुँच और सेवाओं का विस्तार कर रहे हैं।
उनसे प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बड़े आकार का और अधिक पूंजीकृत होना अत्यंत आवश्यक है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि बड़े, अच्छी तरह से पूंजीकृत बैंक न केवल अधिक कुशल होंगे, बल्कि वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अधिक प्रतिस्पर्धी बनकर उभरेंगे, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की वैश्विक स्थिति को मजबूती मिलेगी और देश 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होगा।