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ध्यान हटाने की फिर वही पुरानी चाल

 

भारत के संविधान की प्रस्तावना से धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों को हटाने की मांग अब केवल एक हाशिए की कल्पना नहीं रह गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले जैसे वरिष्ठ और प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा इस विचार के समर्थन में सार्वजनिक बयान देने के बाद, इसने अब राष्ट्रीय राजनीति में एक नई तात्कालिकता और प्रमुखता हासिल कर ली है।

ये शब्द धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से, प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान 1976 में पेश किए गए थे। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जनता पार्टी की सरकार, जिसमें आरएसएस से संबद्ध नेता भी शामिल थे, जिसने इंदिरा गांधी की जगह ली और आपातकाल के दौरान संविधान में किए गए कई बदलावों को उलट दिया, उसने इन शब्दों को बने रहने दिया।

यह भी तर्क दिया जाता है कि ये अवधारणाएं नए गणराज्य के संविधान के लिए इतनी केंद्रीय थीं कि इसके मूल लेखकों ने प्रस्तावना में इन शब्दों का उपयोग करना भी आवश्यक नहीं समझा। जब 1970 के दशक के दौरान भारत की राष्ट्रीय पहचान को लेकर एक संघर्ष उभरने लगा, तो इंदिरा गांधी ने इन संशोधनों को उचित और राजनीतिक रूप से फायदेमंद समझा।

दिलचस्प बात यह है कि हिंदुत्व शिविर ने ऐतिहासिक रूप से इन अवधारणाओं का कभी विरोध नहीं किया था। गांधीवादी समाजवाद जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी का पूर्व अवतार) के मूल सिद्धांतों का एक हिस्सा था। हिंदुत्व के समर्थकों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर छद्म धर्मनिरपेक्षता का पालन करने का आरोप लगाया और निहितार्थ रूप से खुद को वास्तविक धर्मनिरपेक्षवादी बताया।

पिछले कुछ वर्षों में धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों ने भारतीय संदर्भ में विशिष्ट अर्थ प्राप्त कर लिए हैं। धर्मनिरपेक्षता भारतीय सभ्यतागत विरासत या किसी भी धर्म की अस्वीकृति नहीं है, बल्कि राज्य द्वारा सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की प्रतिबद्धता है।

इंदिरा गांधी को हिंदू भावनाओं को बढ़ावा देने वाली के रूप में देखा गया था। समाजवाद निजी संपत्ति या उद्यम के प्रति शत्रुता के बारे में नहीं है, बल्कि इस तथ्य की एक व्यावहारिक सराहना है कि राज्य को गरीबी से निपटने और समाज के वंचित वर्गों के लिए अवसरों का विस्तार करने के लिए सक्रिय उपाय करने चाहिए। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद शब्द भारतीय राजनीति में एक व्यापक सहमति को दर्शाते हैं जो दशकों से कायम है।

इन शब्दों पर एक निरर्थक बहस छेड़कर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।

संभवतः बहस का उद्देश्य ही एक विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाना है, बिना इस मांग के लिए कोई वैचारिक, कानूनी या व्यावहारिक तर्क दिए।

भारत की चुनौती इन दो शब्दों के बारे में नहीं है, बल्कि भेदभाव, गरीबी और अविकसितता से निपटने का उसका निरंतर संघर्ष है, जो अक्सर उसके नागरिकों की जाति और धार्मिक उत्पत्ति से प्रभावित होते हैं। संघ परिवार और भाजपा इन चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करके देश की बेहतर सेवा कर सकते हैं, बजाय इसके कि स्थापित शब्दावली पर विभाजनकारी बहसों पर ऊर्जा बर्बाद करें।

बिहार विधानसभा चुनाव में नये फॉर्म के जरिए मतदाताओं की वैधता जांचने की प्रक्रिया से ठीक पहले इस पर विवाद हो रहा है, जिसे हम पहले के अनुभवों के आधार पर ध्यान भटकाने की एक और साजिश मान सकते हैं। बार बार बांग्लादेशी घुसपैठ का बहाना बनाया गया और इसी बहाने पश्चिम बंगाल के अनेक लोगों को भी बिना किसी जांच के बांग्लादेशी घोषित कर दिया गया।

चुनाव संबंधी आरोपों के क्रम में चुनाव आयोग अब तक महाराष्ट्र की मतदाता सूची संबंधी मांग को पूरा नहीं कर पाया है। सरकार बार बार अर्थव्यवस्था की गाड़ी आगे बढ़ने का दावा तो कर रही है पर आम भारतीय नागरिक में प्रति व्यक्ति आय लगातार कम क्यों हो रही है, इस सवाल पर चुप है।

यह एक नई बीमारी सरकार में आयी है कि वे जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर ना तो प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और ना ही प्रेस वालों को ऐसे सवाल पूछने का अवसर ही प्रदान करते हैं। जिन शब्दों को लेकर खुद उपराष्ट्रपति धनखड़ भी मैदान में उतरे हुए हैं, उन शब्दों से देश की गरीब जनता को रोटी मिलती है क्या, इस सवाल से सरकार भाग रही है।

मणिपुर का मसला अब तक यथावत है जबकि तैयारी के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी वहां ना जाकर विदेश दौरे पर चले गये। कुल मिलाकर यह खेल बच्चों को बहलाने की पुरानी दादी- नानी वाली तकनीक जैसी है। जिसमें बच्चे के रोने पर घर के बड़े उसे अचानक चांद अथवा पेड़ या चिड़िया दिखाने लगते थे और उस पर ध्यान देकर बच्चा अपना रोना भूल जाता था। अब भूख की परेशानी को यदि इन बहसों से दूर किया जा सके तो कोई इस पर बहस करें वरना देश का असली सवाल तो दो वक्त की रोटी का ही है।