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टेंडर रेट खुला तो असली खेल उजागर हो गया

बहती गंगा में हाथ धोने वाले इस निविदा को लटकाना चाहते हैं

  • रेट में अधिक भुगतान की हुई पुष्टि

  • पहले से लाभ उठा रहा गिरोह सक्रिय

  • दो कंपनियों ने अधिक लाभ लिया

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः तीन साल की जद्दोजहद और निरीक्षण करने वाली टीमों की अनुशंसा पर इसका टेंडर निकलने के बाद भी छह बार किसी न किसी बहाने रद्द होता रहा। इसके बाद भी टेंडर कमेटी में शामिल एम्स (दिल्ली) और एजीएमटी (लखनऊ) के सदस्यों ने अंततः इस टेंडर को संपन्न कराने में रिम्स के निदेशक का साथ दिया।

टेंडर जब खुला तो पहले तकनीकी बीड खोले गये, जिसमें सारी तकनीकी मुद्दों पर निविदादाता कंपनियों ने अपनी अपनी बात रखी। इस तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर टेंडर कमेटी ने तीन कंपनियों को श्रेष्ठ माना। याद दिला दें कि इन निविदाओं में एक बार भी एबोट ने भाग नहीं लिया था।

टेंडर के दूसरे भाग में जब दरपत्र खोले गये तो रोश कंपनी का दर सबसे कम निकला। इस कंपनी ने सबसे कम आठ करोड़ का दर अंकित किया था। इस दर के खुलते ही स्वाभाविक तौर पर पहले से ट्रॉमा सेंटर में जिस दर पर भुगतान हो रहा था, उस पर और गंभीर सवाल उठ गये। दरअसल टेंडर में न्यूनतम बोलीदाता ने जो दर कोट किया था, उससे करीब तीन गुणा अधिक रकम ट्रॉमा सेंटर की व्यवस्था के तहत किया जा रहा था।

यह बता दें कि सभी ऐसी व्यवस्थाओं में कंपनी अपनी मशीन लगाती है और उसमें होने वाली जांच के काम आने वाले रसायनों (रिजेंट) का भुगतान रिम्स को करना था। सूत्र बताते हैं कि रिम्स में पहले से जारी व्यवस्था के तहत एक अन्य कंपनी मेडॉल को आठ गुणा अधिक भुगतान किया जा रहा है, यह राज भी सबके सामने आ गया।

पहले की व्यवस्था बहाल  रहे इसके लिए एक गुट सक्रिय हो गया। इसी दौरान खुद स्वास्थ्य मंत्री ने इस टेंडर की जांच के लिए एक कमेटी बनाकर काम करने का निर्देश जारी कर दिया। सूत्र बताते हैं कि बहती गंगा में हाथ धोने वालों ने किसी न किसी तरीके से स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी को झांसे में लिया। इसी वजह से आनन फानन में निविदा की जांच के आदेश जारी कर दिये गये।

मामल की भनक दूसरों को भी थी क्योंकि  जो लोग पहले से चली आ रही व्यवस्था के असली लाभार्थी थे, उनकी सक्रियता कैसे और कहां दिखी, इस पर भी लोगों की नजर पड़ी। इस दौरान यह भी साफ हो गया कि दरअसल टेंडर का निष्पादन ना हो जाए, यही इस गिरोह की मंशा थी। इसके लिए बाहर के कई लोगों की मदद ली गयी, जो बार बार किसी न किसी रूप में तकनीकी व्यवधान खड़ी करते रहे।

जांच समिति में शामिल किये गये लोगों को भी शायद इस खींचतान का पूरा अंदेशा था। इसी वजह से निविदा निष्पादित ना हो, इसके लिए अजीब सवाल खड़े किये गये। टेंडर कमिटि में शामिल सदस्यों से यह पूछा गया कि जब टेंडर एक साल के लिए था तो इसकी अवधि क्यों बढ़ायी गयी। यह सवाल उनलोगों ने किया, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित मानदंड की जानकारी आम आदमी से बेहतर थी।

यह तो आम आदमी भी समझ सकता है कि कोई भी बड़ी कंपनी जब बेशकीमती मशीन स्थापित करती है तो उसे एक साल के भीतर हटाने का निर्देश अव्यवहारिक है। रिम्स की निविदा में पहले ही इस शर्त में विधिवत संशोधन कर इसे पांच साल  का कर दिया गया था।

(शेष कल के अंक में)