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पड़ोसियों के घऱ के आग की आंच

नेपाल फिर जल रहा है। भारत का पड़ोसी देश इस समय राजशाही की वापसी की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के कारण अशांति का सामना कर रहा है। राजधानी काठमांडू और आसपास के इलाकों में पुलिस और राजा ज्ञानेंद्र के समर्थकों के बीच झड़पों में दो लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए, जिसके बाद देश के बड़े हिस्से में स्थगन की स्थिति पैदा हो गई है।

कथित तौर पर, प्रदर्शनकारियों ने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की वापसी की मांग करते हुए कई सरकारी आवासों में तोड़फोड़ की और विभिन्न स्थानों पर आग लगा दी। इसके साथ ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के प्रमुख और देश के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और विपक्ष के नेता प्रचंड के खिलाफ भी नारे लगाए गए।

स्थिति को सामान्य करने के लिए काठमांडू सहित विभिन्न शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया और सेना की गश्ती शुरू कर दी गई। पिछले फरवरी में एक वीडियो संदेश में ज्ञानेन्द्र ने देश में अस्थिर स्थिति पर चिंता व्यक्त की थी और देशवासियों से उनके साथ खड़े होने का आग्रह किया था। उनके लिए अभूतपूर्व समर्थन उमड़ पड़ा। हिंदू राष्ट्र की वापसी की भी मांग हो रही है।

उल्लेखनीय है कि लगभग दो दशक पहले भारत के उत्तरी पड़ोसी देश में राजशाही थी। ज्ञानेन्द्र 2001 में शाही तख्तापलट के बाद राजा बने, लेकिन उनकी तानाशाही गतिविधियों के कारण 2006 में उन्हें पदच्युत कर दिया गया। इसके बाद 2008 में संविधान में संशोधन कर 240 साल पुरानी राजशाही को समाप्त कर देश में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना की गई।

और सात वर्षों के भीतर नेपाल में एक नया धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया गया। 2008 में नेपाल के संघीय लोकतंत्र बनने के बाद से लगभग दो दशकों तक देश के मुख्य राजनीतिक दलों ने गठबंधन के रूप में देश पर शासन किया है, लेकिन वे वह स्थिरता और आर्थिक विकास प्रदान करने में सक्षम नहीं रहे हैं जिसकी लोगों ने आशा की थी।

दरअसल, पिछले सत्रह वर्षों में उस देश में 14 सरकारें सत्ता में आई हैं। इस दौरान अर्थव्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, उल्टे महंगाई ने लोगों का जीवन और अधिक दयनीय बना दिया। पर्याप्त रोजगार अवसरों की कमी के कारण कई लोग विदेश पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री सहित देश के नेताओं और सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों से जनता के मन में राजतंत्र समर्थक भावना जागृत हो रही है।

यदि भविष्य में राजतंत्रवादी अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेंगे, तो उन्हें स्वतःस्फूर्त जन समर्थन प्राप्त नहीं होगा।

खासकर जहां ज्ञानेंद्र के शासनकाल के दौरान हुई तानाशाही और अन्याय की घटनाएं अभी भी लोगों के दिमाग से पूरी तरह से मिट नहीं पाई हैं। दूसरी ओर, यदि वर्तमान सरकार राजतंत्रवादियों को दबाने के लिए अत्यधिक बल का प्रयोग करती है, तो इस बात की प्रबल आशंका है कि उनका भी यही हश्र होगा।

वर्तमान स्थिति को देखते हुए, नेपाल में अशांति फिलहाल कोई समस्या नहीं है। इस बीच, एक अन्य पड़ोसी देश, बांग्लादेश में राजनीतिक अशांति, निस्संदेह दिल्ली में चिंता बढ़ा रही है। बांग्लादेश में चीन की घुसपैठ भारत और खासकर पूर्वोत्तर के सात राज्यों के लिए चिंता का विषय है।

अरुणाचल प्रदेश को चीन काफी समय से अपना इलाका बताता आ रहा है और 1962 के युद्ध के बाद चीन पर दोबारा भरोसा करने का कोई कारण भी नहीं है। इसलिए बांग्लादेश के घटनाक्रमों से भारत का प्रभावित होना स्वाभाविक है।

जहां अपने समर्थकों से वर्चुअल मीटिंग करते हुए शेख हसीना ने जल्द ही देश लौटने और अत्याचारियों को दंडित करने की बात कही है। इससे भी इस पड़ोसी देश का माहौल बिगड़ा हुआ है।

बांग्लादेश में चीन के अलावा पाकिस्तान की घुसपैठ भी चिंता बढ़ाने वाली बात है। अब हालत यह है कि दोनों देश यानी भारत और बांग्लादेश अपने अपने चिकन नेक को बचाने की जद्दोजहद में है।

सिलिगुड़ी के पास भारत का चिकन नेक है जबकि पहली बार टिपरा मोथा प्रमुख ने अपने एवं मिजोरम के बगल में बांग्लादेश के चिकन नेक की चर्चा कर बांग्लादेश को डरा दिया है। यद्यपि नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंध उस तरह से कायम नहीं हैं, फिर भी कूटनीतिक कारणों से दिल्ली के पास अपने प्रयास जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

बल्कि, इस मामले में बिना प्रतिक्रिया दिए स्थिति का अवलोकन करना सबसे अच्छा विकल्प है। दूसरी तरफ बांग्लादेश की घटनाओं का भी सीमावर्ती इलाकों पर असर पड़ता है और इससे भारतीय रिश्तों पर उतार चढ़ाव की स्थिति बनती है। इनसे अलग पाकिस्तान के बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के हालात भी भारत को लगातार नजरदारी जारी रखने की हिदायत देते हैं। जिन इलाकों में चीन का दखल लगातार बढ़ रहा है।