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हमने अप्रासंगिक कानूनों को निरस्त किया हैः नरेंद्र मोदी

राष्ट्रीय एकता भारत की न्याय व्यवस्था की आधारशिला है


  • न्याय संहिता की मजबूती हमारी जिम्मेदारी

  • हमें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना है

  • भारत के सपने बड़े हैं और नागरिकों की आकांक्षाएं ऊंची

राष्ट्रीय खबर


 

जयपुरः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 25 अगस्त राजस्थान के जोधपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय के प्लेटिनम जुबली समारोह के समापन समारोह को संबोधित किया। उन्होंने राजस्थान उच्च न्यायालय संग्रहालय का भी उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत महाराष्ट्र से प्रस्थान के दौरान खराब मौसम की वजह से कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने में हुई देरी के कारण हुई असुविधा पर खेद जताते हुए की।

श्री मोदी ने कहा, राष्ट्रीय एकता भारत की न्याय व्यवस्था की आधारशिला है और इसे मजबूत करने से राष्ट्र और इसकी व्यवस्थाएं और मजबूत होंगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्याय सरल और सुबोध है, लेकिन कई बार प्रक्रियाएं इसे जटिल बना देती हैं। उन्होंने खुशी जताई कि भारत ने इस दिशा में कई ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं।

उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने कई अप्रासंगिक औपनिवेशिक कानूनों को निरस्त कर दिया है। श्री मोदी ने कहा कि आजादी के दशकों बाद औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर भारत ने भारतीय दंड संहिता की जगह भारतीय न्याय संहिता को अपनाया है। उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय संहिता दंड के स्थान पर न्याय के आदर्शों पर आधारित है, जो भारतीय चिंतन का आधार भी है। उन्होंने कहा, अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम भारतीय न्याय संहिता की भावना को यथासंभव प्रभावी बनाएं।

उन्होंने भारत के 10वें स्थान से दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने भारत की न्यायिक प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव में प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला और ई-कोर्ट परियोजना का उदाहरण दिया।

 उन्होंने बताया कि अब तक देश की 18,000 से ज्यादा अदालतों का कंप्यूटरीकरण हो चुका है और 26 करोड़ से ज्यादा अदालती मामलों से जुड़ी जानकारी राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के जरिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराई गई है।

अतीत में अदालतों की धीमी गति की प्रक्रियाओं की ओर इशारा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि आम नागरिकों पर बोझ कम करने के लिए राष्ट्र द्वारा उठाए गए प्रभावशाली कदमों ने भारत में न्याय के लिए नई उम्मीद जगाई है। प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की कि उन्होंने कई मौकों पर हमारी मध्यस्थता प्रक्रिया की सदियों पुरानी प्रणाली का लगातार उल्लेख किया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायपालिका ने राष्ट्रीय मुद्दों पर लगातार सतर्क और सक्रिय रहने की नैतिक जिम्मेदारी निभाई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने राष्ट्र प्रथम के संकल्प को मजबूत किया है। लाल किले से अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा उल्लेखित धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही वर्तमान सरकार ने इस मामले को अब उठाया है, लेकिन भारत की न्यायपालिका ने हमेशा इसके पक्ष में वकालत की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता के मामलों में न्यायालय का रुख नागरिकों में विश्वास पैदा करता है।उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत को कई वैश्विक एजेंसियों और संगठनों से प्रशंसा मिली है। श्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत डीबीटी से लेकर यूपीआई तक कई क्षेत्रों में कैसे काम करता है और एक वैश्विक मॉडल के रूप में उभरा है। उन्होंने आगे कहा कि न्याय प्रणाली में भी इसी अनुभव को लागू किया जाना चाहिए।