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भाजपा के समक्ष आदिवासी सीटें बचाने की चिंता

तीन दर्जन सीटों का गणित बदल देगा सारा चुनावी समीकरण


  • 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित

  • आठ सीटें अनुसूचित जाति वर्ग की है

  • हेमंत की गिरफ्तारी से नाराजगी बढ़ी


राष्ट्रीय खबर

रांचीः लोकसभा चुनाव परिणाम झारखंड भाजपा के लिए सुखद नहीं रहा है। अंदरखाने से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व इस राज्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की जद्दोजहद में है। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी का आदिवासी समुदाय पर उल्टा असर हुआ है, यह तो चुनाव परिणाम ही बता चुके हैं क्योंकि अर्जुन मुंडा सहित सभी भाजपा के आदिवासी उम्मीदवार चुनाव में पराजित हो चुके हैं।

यह बताने की कोशिश की जा रही है कि उड़ीसा के मुख्यमंत्री के जरिए भाजपा अपने इस जनाधार को वापस पाना चाहती है पर स्थानीय स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता इसे फैसले को भी संदेह की नजर से देख रहे हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं का तर्क है कि किसी पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री के लिए झारखंड में अधिक समय देना व्यवहारिक तौर पर संभव नहीं होगा।

लिहाजा झारखंड भाजपा को प्रदेश स्तर पर अपनी गुटबाजी से उबरने की जरूरत है। इसके बीच ही कुछ लोग फिर से रघुवर दास की झारखंड की सक्रिय राजनीति में वापसी की चर्चा भी कर रहे हैं। वैसे इन कवायदों के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को झारखंड की 28 आदिवासी सीटों पर संघर्ष करना पड़ेगा, यह हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद ही स्पष्ट हो गया था।

81 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। यह सीटें इस प्रकार हैं।

2-बोरियो,  3-बरहेट, 4-लिटीपाड़ा, 6-महेशपुर, 7-शिकारीपाड़ा, 10-दुमका, 11-जामा, 45-घाटशिला, 46-पोटका, 51-सरायकेला,

57-खरसावां, 52-चाईबासा, 53-मझगांव, 54-जगनाथपुर, 55-मनोहरपुर, 56-चक्रधरपुर, 58-तमाड़, 62-खिजरी, 66-मांडर, 59-तोरपा, 60-खूंटी, 67-सिसई, 68-गुमला, 69-बिशुनपुर, 70-सिमडेगा, 71-कोलेबिरा, 72-लोहरदगा और 73-मनिका।

कुल अस्सी सीटों में से इन अठ्ठाइस का फैसला सत्ता के रास्ते खोल सकता है, यह जगजाहिर है। इससे पहले भी झारखंड में भाजपा के शासन की नींव रखने में इन सीटों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। रघुवर दास के कार्यकाल के अनेक फैसलों ने आदिवासी समुदाय के साथ साथ पार्टी के आदिवासी विधायकों तक को नाराज कर दिया था। जिसका नतीजा पिछले विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था।

अब बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया गया तो भाजपा को इस जनाधार को वापस पाने में अच्छी कामयाबी मिली थी। बाद में जमीन घोटाला में हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी ने आदिवासी समुदाय के बीच भाजपा को आदिवासी विरोधी चेहरा बना दिया। श्री मरांडी अपनी लगातार कोशिशों के बाद भी इस खोयी हुई जमीन को वापस नहीं पा सके। इस कमी को उड़ीसा के नये भाजपा मुख्यमंत्री मोहन मांझी कितना दूर कर पायेंगे, यह देखने वाली बात होगी
वैसे इसी कड़ी में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी गौर करना होगा। झारखंड में 15-देवघर, 26-सिमरिया, 27-चतरा, 30-जमुआ, 37-चंदनकियारी, 47-जुगसलाई, 65-कांके और 74-लातेहार (एससी) यानी कुल आठ सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में झारखंड के इस समुदाय की अनदेखी का भी असर पड़ा है। दरअसल अनुभव और वरीयता के आधार पर इस बार बीडी राम और विद्युत वरण महतो प्रवल दावेदार थे। दोनों ही झारखंड के दो प्रभावशाली जाति समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लिहाजा आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की चुनौतियां बढ़ने जा रही हैं।