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अबकी बार चार सौ पार किसके सहारे

भारतीय जनता पार्टी ने नारा दिया है फिर एक बार मोदी सरकार और अबकी बार चार सौ पार। यह नारा दे तो दिया गया और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने लोकसभा में खड़े होकर दी। उन्होंने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले बीजेपी को 370 सीटें मिलेंगी और एनडीए गठबंधन चार सौ का आंकड़ा पार करेगा।

लेकिन मूड ऑफ द नेशन सर्वे कुछ और ही कहता है। इस सर्वेक्षण में यह भी स्पष्ट है कि मोदी का तीसरा कार्यकाल उतना आसान नहीं होगा, जितना भाजपा की तरफ से दावा किया जा रहा है। इस बात को जनता समझ चुकी है कि जब अचानक चुनावी सर्वेक्षण आने लगते हैं तो यह साफ हो जाता है कि मोदी सरकार टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को संदेश देने का काम कर रही है।

इन तमाम टीवी चैनलों को प्रधानमंत्री कार्यालय से हुक्म देने वाले की भी पहचान हो चुकी है। तमाम चैनल ऐसे सर्वेक्षण में फिर से मोदी की सरकार बनाने की दावेदारी में जुटे हैं। इसके बीच से ही जो साफ संकेत निकल रहा है वह यह है कि एनडीए की सीटों की संख्या घटने वाली है। इसमें शर्त यह है कि जिन राज्यों में भाजपा ने पूरे विपक्ष का सुपड़ा साफ कर दिया था, वहां सीटों की समीकरण वैसा ही रहे।

दूसरी तरफ इन्हीं आंकड़ों से यह बात निकल रही है कि एनडीए को 2019 के मुकाबले 18 सीटें कम मिलेंगी। वहीं, इंडिया अलायंस 166 सीटों पर कब्जा कर सकता है। जिसमें से कांग्रेस को ही 71 सीटें मिलेंगी। 42 सीटों पर अन्य पार्टियों का कब्जा हो सकता है। नतीजा यह है कि इस सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने पर भी भाजपा को उखाड़ फेंका नहीं जा सकेगा।

यह भी सर्वेक्षणों द्वारा परोसे गये आंकड़ों का छिपा हुआ निष्कर्ष है। बजट सत्र से लेकर राष्ट्रपति के प्रतिक्रिया भाषण तक प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों की जो बॉडी लैंग्वेज देखने को मिली, उससे साफ हो गया है कि एक बार फिर मोदी सरकार की वापसी हो रही है। अब मूल मुद्दे पर आते हैं कि अगर वाकई अपनी वापसी को लेकर मोदी इतने आश्वस्त हैं तो रेवड़ी की तरह इस दौर में भारत रत्न क्यों बांटे गये।

जिन्हें यह सम्मान मिला, उन्हें यह सम्मान पहले भी दिया जा सकता था क्योंकि सभी लोग दिवंगत थे। अपवाद सिर्फ लालकृष्ण आडवामी हैं।

अब अमेरिका की बात करें तो प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ़ फ़्रीडम अमेरिका के दो सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में से एक है। टीएस एलियट और जॉन स्टीनबेक कैनेडी की पसंद थे, बज़ एल्ड्रिन और नील आर्मस्ट्रांग निक्सन की सूची में थे और मदर टेरेसा को रीगन के कार्यकाल के दौरान सम्मानित किया गया था।

ओबामा ने 117 पदक दिए और प्राप्तकर्ताओं में स्टीफन हॉकिंग, डेसमंड टूटू, सिडनी पोइटियर, एंजेला मर्केल, बॉब डायलन, टोनी मॉरिसन, बिल क्लिंटन, ग्लोरिया स्टीनम, टॉम हैंक्स, ब्रूस स्प्रिंगस्टीन, माइकल जॉर्डन और उनके अपने डिप्टी जो बिडेन (वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति) भी शामिल थे। ।

बिडेन ने क्रिटिकल केयर नर्स को पदक प्रदान किया, जो कोविड-19 वैक्सीन प्राप्त करने वाली पहली अमेरिकी थीं। फ़्रांस का सर्वोच्च पुरस्कार लीजन ऑफ़ ऑनर है। जब इसे 1802 में नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा स्थापित किया गया था, तो उन लोगों ने इसका विरोध किया था जिनका मानना था कि यह एक विशुद्ध सैन्य पुरस्कार होना चाहिए।

लीजन ऑफ ऑनर की श्रेणियां हैं। सबसे बुनियादी शूरवीर है जिसके बाद अधिकारी, कमांडर, भव्य अधिकारी और भव्य क्रॉस आते हैं। कपूरथला के महाराजा जगतजीत सिंह को 20वीं सदी की शुरुआत में ग्रैंड क्रॉस से सम्मानित किया गया था। फ्रेंकोइस मिटरैंड ने 1987 में सत्यजीत रे को कमांडर बनाया और लगभग एक दशक बाद जैक्स शिराक ने शिवाजी गणेशन को शूरवीर नियुक्त किया।

वहीं पिछले साल इमैनुएल मैक्रॉन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया था। दिलीप कुमार एकमात्र भारतीय हैं जिन्हें पाकिस्तान का निशान-ए-इम्तियाज दिया गया है। बांग्लादेश ने 2011 में इंदिरा गांधी को अपना सर्वोच्च राज्य पुरस्कार दिया था।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप इस वर्ष के भारत रत्नों के बारे में क्या कहते हैं, बहुत कम, बहुत जल्दी या बहुत देर से, स्वामीनाथन हमेशा रहेंगे। इसलिए लालकृष्ण आडवाणी, कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह, पीवी नरसिंहाराव और स्वामीनाथन को भी चुनावी हथियार बनाने की मजबूरी आ पड़ी है। इसके जरिए विभिन्न वर्गों को भाजपा अपने साथ जोड़ना चाहती है जो विभिन्न कारणों से उसके वोट बैंक के छिटके हुए हैं। लिहाजा मान सकते हैं कि अकेले राहुल गांधी की यात्रा ने वह शोर पैदा कर दिया है, जिससे मोदी सरकार परेशान है।