Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
क्या भारत में नागरिकों को हासिल है पूरी आजादी? जानिए संविधान प्रदत्त 11 अधिकारों के साथ जुड़ी अहम का... क्या NDA में होगा बड़ा विस्तार? परिसीमन और महिला आरक्षण बिल के बीच DMK, NCP और अकाली दल के साथ आने क... महाराष्ट्र के सांगली में बड़ा हादसा: रेणावी घाट में दो ST बसों की आमने-सामने भीषण टक्कर स्वतंत्रता दिवस 2026: दिल्ली मेट्रो की विशेष व्यवस्था, लाल किला और जामा मस्जिद के लिए सुबह 4 बजे से ... अयोध्या पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महंत परमहंस रामचंद्र दास के स्मृति समारोह में हुए शामिल 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संबोधन, देशवासि... PM मोदी और विदेश नीति पर टिप्पणी से गरमाई सियासत: राजनाथ सिंह और एकनाथ शिंदे ने राहुल गांधी को घेरा,... CJI सूर्य कांत विवाद के बाद सुर्खियों में NALSAR यूनिवर्सिटी, BCI ने वापस लिया निलंबन फैसला 4,200 करोड़ के लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब 15 अगस्त को देश मनाएगा 80वां स्वतंत्रता दिवस, लाल किले पर समारोह के दौरान मौसम पर टिकीं निगाहें

सुप्रीम कोर्ट ने सेबी से पूछा कानून क्यों बदला

  • प्रशांत भूषण ने उठाया था यह मुद्दा

  • नियम संशोधन की वजह से सेबी के हाथ बंधे

  • विदेशी पूंजीनिवेश के अंतिम मालिक का पता नहीं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सेबी से यह बताने को कहा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के स्वामित्व ढांचे में अस्पष्टता को प्रतिबंधित करने वाले महत्वपूर्ण प्रावधानों को रद्द करने के लिए 2018 में कानून में बदलाव क्यों किया गया।

न्यायालय की चिंता न्यायमूर्ति ए.एम. के एक निष्कर्ष के आलोक में थी। सप्रे विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट है कि अडानी समूह के खिलाफ अमेरिका स्थित हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों की सेबी जांच एफपीआई विनियम, 2014 में किए गए संशोधनों के कारण बाधित हो गई थी। इन संशोधनों ने बाजार नियामक को अंडा पहले कि मुर्गी वाली स्थिति मे डाल दिया था।

हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उल्लिखित 12 एफपीआई सहित 13 विदेशी संस्थाओं के स्वामित्व की अपनी जांच में कई खुलासा किये हैं। विशेषज्ञ समिति ने कहा है कि सेबी को खुद इन 13 संस्थाओं पर अपारदर्शी संरचनाएं होने का संदेह था क्योंकि उनके स्वामित्व की श्रृंखला स्पष्ट नहीं थी।

2018 में, ‘अपारदर्शी संरचना’ से संबंधित प्रावधान और एफपीआई में आर्थिक हित के प्रत्येक मालिक की श्रृंखला के अंत में प्रत्येक अंतिम प्राकृतिक व्यक्ति का खुलासा करने में सक्षम होने के लिए एफपीआई की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया था।  जस्टिस सप्रे पैनल मई में ऐसा रिपोर्ट किया था। इसमें कहा गया है कि सेबी को अपने संदेह को दूर करने के लिए, इसकी जांच के लिए इसके लेंस के तहत 13 विदेशी संस्थाओं के अंतिम आर्थिक स्वामित्व के बारे में जानकारी की आवश्यकता होगी, न कि केवल लाभकारी मालिकों के बारे में।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ने घोर नियामक विफलता के लिए सेबी की खिंचाई की है। इसके अलावा, सेबी द्वारा 2018 में अपने एफपीआई कानून में बदलाव इसकी वर्तमान जांच के लिए बिल्कुल घातक है। उन्होंने एफपीआई विनियमों में अपारदर्शी संरचना की परिभाषा को ही हटा दिया है। सेबी अब अपनी वर्तमान जांच में कुछ नहीं कर सकता है। एफपीआई की अपारदर्शी संरचना, इसके लाभकारी मालिकों और संबंधित पार्टी लेनदेन से संबंधित प्रावधानों में संशोधन ऐसे धोखाधड़ी को उजागर होने से रोकने के लिए किए गए थे। इस पर अदालत ने कहा, हम निश्चित रूप से जानना चाहेंगे कि सेबी ने ये बदलाव क्यों किए। श्री भूषण ने जो कहा, उसके अनुरूप, इन संशोधनों के कारण सेबी को लेनदेन की परतों में जाने से रोका जा सकता है, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा।