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कांग्रेस मुक्त भाजपा से भाजपा मुक्त दक्षिण भारत

  • भारत जोड़ो यात्रा का प्रभाव परिणामों पर दिखा

  • एकमात्र भाजपा शासित राज्य था कर्नाटक

  • हिजाब से बजरंग बली तक का नारा फेल

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः हिजाब, टीपु सुल्तान, सावरकर और बजरंग बली जैसे सारे हिंदू कार्ड, जो भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका निभाते रहे, इस बार कर्नाटक में फेल हो गये। दरअसल बोम्मई सरकार को चालीस प्रतिशत कमिशन की सरकार का नतीजा यह निकला कि भाजपा के साथ से चालीस प्रतिशत सीटें भी निकल गयी।

पहले से ही  माना जा रहा था कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए एक एसिड-टेस्ट था। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए परीक्षा कर्नाटक जीतकर लोकसभा चुनाव से पहले दक्कन में सत्ता का विस्तार करना था। कांग्रेस के लिए लड़ाई अस्तित्व की थी। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की आखिरी हंसी का मौका मिला। कर्नाटक की हार के साथ, वास्तव में पूरा दक्षिण भारत अब भाजपा मुक्त हो गया है। इससे भाजपा के नेता द्वय का कांग्रेस मुक्त भारत का प्रचार भी चारों खाने चित हो गया है।

दूसरी ओर, राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद देश में पहली बार किसी बड़े राज्य में मतदान हुआ है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि उस वोट को जीतने के बाद जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार होगा। इसका दूसरा निष्कर्ष यह भी है कि राहुल की उस यात्रा का असर जनता पर हुआ है और राहुल की पदयात्रा वाले इलाकों में कांग्रेस को जबर्दस्त जीत भी मिली है।

अब हालत यह है कि पांच दक्षिण भारतीय राज्यों, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना, में से केवल कर्नाटक भाजपा सत्ता में थी और अब वह राज्य भी हाथ से निकल चुका है। इसलिए दक्षिण भारत को भाजपा मुक्त कहा जा सकता है। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भाजपा समर्थित एनआर कांग्रेस सत्ता में है।

इसलिए कर्नाटक नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए महत्वपूर्ण था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के दौरान कई बार कर्नाटक में सभाएं कर चुके हैं। हिंदुत्व के प्रचार के साथ-साथ हिंदू बहुल कर्नाटक में देशभक्ति और विकास के मोदी स्वर बार-बार गूंज रहे हैं। लेकिन दक्षिण भारत के इस राज्य में मोदी का जादू नहीं चला। कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 135 और भाजपा को 66 सीटें मिली हैं। जेडीएस को 18 सीटों पर जीत मिली है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कर्नाटक में हाल के दिनों में सांप्रदायिक हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। लेकिन कर्नाटक की राजनीति में दो प्रमुख हिंदू समुदायों, लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच संघर्ष हमेशा प्रमुख रहा है। भाजपा की नजर उस पर थी। लिंगायतों को भाजपा का कुछ समर्थन हासिल था।

लेकिन वोक्कालिगाओं के बीच भाजपा का प्रभाव बहुत कम है। भले ही भाजपा ने चुनाव प्रचार में हिंदुत्व कार्ड नहीं खेला, लेकिन उसने हिंदुत्व का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसका एक बड़ा उदाहरण पिछले साल हिजाब विरोधी आंदोलन है। कोर्ट को कार्रवाई करनी पड़ी। और अंततः कर्नाटक में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इतना ही नहीं, 2022 में कर्नाटक में हलाल मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर कोलाहल शुरू हो गया था। श्री राम सेना, बजरंग दल, हिंदू जागरण बेडिक जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों की मांगों के बाद भाजपा सरकार भी कर्नाटक विधानसभा में एक बिल पेश करने की तैयारी कर रही है। अब चुनाव परिणाम यह बता रहे हैं कि भाजपा के यह सारे हिंदूवादी कार्ड आम जनता से जुड़े सवालों के आगे ध्वस्त हो चुके हैं। अब जनता अपने मुद्दों पर भाजपा से सफाई मांग रही है।