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ना पूछो कोई हमें जहर क्यों.. … ….

ना पूछो और ना पूछने दो, यह भारतीय राजनीति का नया फैशन है। इसकी चर्चा इसलिए अधिक है कि पहले बोलने की वजह से अरविंद केजरीवाल को 25 हजार का जुर्माना लगा है। दूसरी तरफ बोलने के पहले ही असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा यह चेतावनी दे रहे हैं कि कुछ उल्टा बोला तो मामला कर देंगे। ना पूछो का दूसरा नमूना राहुल गांधी भी है।

जब तक अडाणी पर सीधा सवाल नरेंद्र मोदी से नहीं पूछा था तब तक सब ठीक था। सवाल पूछ लिया तो अचानक सूरत की अदालत का फैसला आ गया और फैसला आने के तुरंत बाद सदस्यता भी खारिज हो गयी। अब लोग इस पर भी पूछ रहे हैं। सवाल पूछना इतना राष्ट्र विरोधी कैसे हो गया, यह बात समझ में नहीं आ रही है।

वइसे इनलोगों से ज्यादा चालाक तो ममता बनर्जी रही। उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं बल्कि अपने धरना मंच पर वाशिंग मशीन चलाकर ही वह बता दिया, जो वह पूछना चाहती थी।  सवाल पूछने की बात है तो सुप्रीम कोर्ट भी कई मुद्दों पर केंद्र सरकार से सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ कानून मंत्री किरेण रिजिजू माईलॉर्ड लोगों से सवाल पूछ रहे हैं। अब वकीलों का समूह रिजिजू से सवाल पूछ रहा है।

इसी बात पर एक चर्चित फिल्म अमानुष का यह गीत याद आने लगा है। इस फिल्म की चर्चा इसलिए भी अधिक है क्योंकि बांग्ला फिल्मों के सुपरस्टार उत्तर कुमार ने इस फिल्म में अभिनय किया था। वैसे भी फिल्म को बांग्ला में बनने के बाद हिंदी में बनाया गया था। इस गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

न पूछो कोई हमें ज़हर क्यों पी लिया

ज़हर यह पी लिया तो तो थोड़ा सा जी लिया 2

ना पूछो कोई हमें पी के ना भूख लगे

ना रहे दर्द कोई गरीबो का तो नहीं

ऐसा हमदर्द कोई कब तक हम आहें

भरते ना पिटे तो क्या करते

पी गयी आज हमें डंस गए नाग हमें

सुना है ज़हर से ही ज़हर मरा करता है

ना पूछो कोई हमें ज़हर क्यों पी लिया

ज़हर यह पी लिया तो तो थोड़ा सा जी लिया

ना पूछो कोई हमें

मिट्टी के प्याले जैसा सभी मुझे तोड़ गए

खाली बोतल की तरह रास्ते में छोड़ गए

झूठे तो पूजे जाएँ सजा यह सच्चे पाए

जुल्म निर्दोष रहा न्याय खामोश रहा

तू भी भगवन क्या इंसाफ किया करता है

ना पूछो कोई हमें ज़हर क्यों पी लिया

ज़हर यह पी लिया तो थोड़ा सा जी लिया

थोड़ा सा जी लिया

तो सवाल पूछने का ऐसा असर आखिर है तो क्यों है। अचानक से भारतीय पॉलिटिक्स के आसमान पर यह कौन से बादल मंडराने लगे हैं जो माहौल को गर्म कर रहे हैं। सवाल तो दोनों दलों के भीतर भी है। भाजपा की बात करें तो अब नितिन गडकरी भाजपा नेतृत्व से दूरी बनाकर चल रहे हैं। चुनाव के वक्त क्या होगा, कहना मुश्किल है।

दूसरी तरफ खडगे के खिलाफ अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके शशि थरूर से भी लोग दूरी बनाकर चल रहे हैं। इसलिए इन दोनों दलों की हालत अंदर से लगभग एक जैसी ही है। इस पर सवाल पूछो तो दोनों ही दलों के दूसरे नेता भड़क जाते हैं। कुछ तो ऐसे नाराज हुए मानो अदालत होते तो अरविंद केजरीवाल की तरह मुझपर भी आर्थिक जुर्माना लगा देते। आखिर सवालों से इतना घबड़ाना क्यों। सवाल उठना ही लोकतंत्र के जिंदा होने की पहचान है।

लेकिन जनता का सवाल यह भी है कि संसद चलाने में जनता का पैसा खर्च होने के बाद भी संसद का काम चल क्यों नहीं पाता है। यही हाल विधानसभाओं का भी है। अपने पैसे से यह काम करना पड़ता तो जनप्रतिनिधि ऐसे समय नष्ट करते क्या, यह आम सवाल है जो आम जनता यानी देश के मैंगो मैन का है।

देश से बाहर निकले तो अमेरिका और जर्मनी भारतीय लोकतंत्र से सवाल पूछ रहे हैं। इन विदेशी सवालों से हमारी विदेश नीति का जो ढोल बजाया जाता रहा है, उसकी हवा निकल गयी है। अब विदेश से सवाल करने वालों को यह तो नहीं कह सकते कि राष्ट्रद्रोही हो और पाकिस्तान चले जाओ। वे तो इस देश में हैं ही नहीं।

अब झारखंड की बात करें तो गनीमत है कि पूर्व राज्यपाल के पास आया चुनाव आयोग का लिफाफा चिपक गया। लिफाफा खुलता तो पता नहीं ऊंट किस करवट बैठता। भाई लोगों ने तो हेमंत सोरेन की गाड़ी को पंक्चर करने का पूरा इंतजाम कर लिया था। ऐन वक्त पर सरयू राय ने पूरे अभियान की हवा अपनी जानकारी की बदौलत निकाल दी।

यह राय जी (सरयू राय) भी बड़े जिद्दी आदमी है। उनकी जिद ने भाजपा को किसी खास तरीके से हेमंत सोरेन पर हमला करने के लायक ही नहीं छोड़ा है। जो भी हमला होता है वह सवाल घूमकर भाजपा की तरफ गोला बनकर गिरता है। इसलिए सवाल कौन पूछे और किससे पूछे।