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फिर से साबित हुआ कि दरअसल सोना धरती के अंदर तैयार नहीं हुआ

  • धरती पर काफी गहराई में सोने की खदानें

  • उनके उत्पन्न होने लायक माहौल धरती पर नहीं

  • सुदूर अंतरिक्ष के महाविस्फोट से बनते हैं ऐसे धातु

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सोना के प्रति महिलाओं का आकर्षण प्राचीन काल से रहा है। इसके अलावा प्राचीन काल के इतिहास के पन्ने पलटने पर भी यह पता चलता है कि उस दौर में भी धनवान लोग सोना एकत्रित किया करते थे। आज भी दुनिया में कई स्थानों पर सोने की खदानें हैं, जो अत्यंत गहराई में है। वहां से सोना निकालने का खर्च भी अधिक होने की वजह से बाजार में आते आते यह धातु और महंगी हो जाती है।

बाजार में इसकी मांग इस वजह से भी है क्योंकि लोग इसे भी अपने धन संचय का एक तरीका मानते हैं। लेकिन यह सवाल पहले से ही वैज्ञानिकों के मन में रहा है कि आखिर इस सोने की उत्पत्ति धरती पर किन परिस्थितियों में हुई होगी। प्रारंभिक आकलन से यह पाया गया था कि समय समय पर जो उल्कापिंड धरती के अंदर आकर धंस गये हैं, यह सोना भी उनके साथ ही आया है। यह धातु धरती की परिस्थितियों में पैदा होने वाली रासायनिक संरचना ही नहीं है। अब इस बात की फिर से पुष्टि हो गयी है।

खगोल वैज्ञानिकों की मानें तो दरअसल यह सोना अंतरिक्ष में बड़े आकार के टक्करों की वजह से तैयार होता है। वर्ष 2021 के दिसंबर माह में भी वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही टक्कर को देखा था। जिसके विश्लेषण से पता चला कि इस भीषण टक्कर की वजह से वहां पर भारी धातुओँ मं सोना और प्लेटिनम भी बने हैं।

दरअसल ऐसे टक्कर जब होते हैं तो वहां ऊर्जा का विस्फोट इतने बड़े पैमाने पर होता है कि वहां के गैस और तारों के बीच मौजूद सारे तत्व आणविक स्तर पर विखंडित हो जाते हैं। ऐसे में उनके बीच आपसी रासायनिक प्रतिक्रिया से ही ऐसे धातुओं का निर्माण होता है। जो सौर कण के तौर पऱ उड़ते हुए किसी उल्कापिंड, ग्रह अथवा तारे के करीब चले जाते हैं। यह पहले ही पता चल चुका है कि एक उल्कापिंड ऐसा भी है, जिसमें दो तिहाई सोना और शेष हिस्सा लोहा है। इस पर अभियान करने की नासा की अपनी तैयारी चल रही है।

अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के मुताबिक जब गामा किरणों का विस्फोट होता है जो वे अत्यधिक ऊर्जा पैदा करते हैं। यह विस्फोट कई मिलिसेकंड से लेकर कई घंटों तक का हो सकता है। ऐसे विस्फोटों को खगोल विज्ञान की भाषा में सुपरनोवा कहा जाता है। ऐसे ही किसी महाविस्फोट की वजह से ही हमारे इस सौरमंडल की भी रचना हुई है।

वेइनबर्ग के नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफसर वेन फेई फोंग ने कहा कि इतनी दूरी से बहुत कुछ नजर नहीं आने के बाद भी बाहरी दुनिया में हर पल कुछ न कुछ बदलाव होता रहता है। इसके बीच ही बड़ी टक्करों के गैस के स्तर पर जो रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती हैं, सोना भी उसी टक्कर का अन्यतम परिणाम है। ऐसी टक्करों में बहुत सारी दूसरी चीजें भी उत्पन्न होती हैं, जिनके बारे में हमारे विज्ञान को शायद अभी पूरी जानकारी नहीं है। इसलिए ऐसे विस्फोटों को ही सोना बनाने वाली फैक्ट्री के तौर पर समझा जाना चाहिए।

यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम के एसोसियेट प्रोफसर डॉ मैट निकोल ने कहा कि किलोनोवा स्तर पर विस्फोटों से ही सोना उत्पन्न होता है। बाद में यही सोना किसी उल्कापिंड के जरिए अथवा किसी दूसरे माध्यम से कहीं और जाता है। ठीक ऐसा ही धरती पर पाय जाने वाले सोना के साथ भी हुआ है।