Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
उज्जैन सराफा कन्या स्कूल शिफ्टिंग पर बवाल: 12 KM दूर दाऊदखेड़ी भेजने के विरोध में सड़कों पर उतरीं छा... भोपाल के CSD डिपो में ऑन ड्यूटी SSB जवान ने खुद को मारी गोली, मराठी में मिला सुसाइड नोट; पत्नी से मा... सतना में लोकायुक्त का बड़ा छापा: नागौद बैंक के शाखा प्रबंधक 96 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों ... मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बदहाल सड़कें, बारिश में दलदल पार कर स्कूल जा रहे मासूम भरण-पोषण केस में MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: प्राइवेसी के नाम पर खारिज नहीं कर सकते कॉल रिकॉर्डिंग, फ... छिंदवाड़ा में 100 किमी दूर कलेक्ट्रेट पहुंचे मासूम: 3 बजे छुट्टी कर शाम 7 बजे तक कमरे में बंद रहते ह... गुना में बलराम महोत्सव के दौरान बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य के बयान पर भारी बवाल भोपाल में दिखा पहला 'जेन अल्फा' प्रोटेस्ट: KVS में विलय के खिलाफ सड़क पर उतरे रीजनल स्कूल के 400 छात... देहरादून-ऋषिकेश हाईवे पर भीषण सड़क हादसा, ईको कार के उड़े परखच्चे और 4 लोगों की मौत DJB सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट घोटाला: कोर्ट में सत्येंद्र जैन ने खुद रखीं दलीलें, रिमांड और न्यायिक हिर...

केंद्र के कानून पर मुख्यमंत्री ने आपत्ति जतायी

  • आदिवासी पेड़ों की पूजा और रक्षा करते हैं

  • निजी डेवलपर्स को अनुमति देना गलत होगा

  • ग्राम सभी की सहमति के शर्त को गायब कर दिया

रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए उस कानून पर आपत्ति जताई है, जिसमें कहा गया है कि आदिवासियों और वनों पर निर्भर रहने वालों की सहमति सुनिश्चित किए बिना निजी डेवलपर्स वनों को काट सकेंगे। मुख्यमंत्री ने आग्रहपूर्वक इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने आज पत्र के माध्यम से कहा है कि झारखण्ड में 32 प्रकार के आदिवासी रहते हैं, जो प्रकृति के साथ समरसतापूर्वक जीवन जीते हैं। ये पेड़ों की पूजा और रक्षा करते हैं। जो लोग इन पेड़ों को अपने पूर्वजों के रूप में देखते हैं, उनकी सहमति के बिना पेड़ों को काटना उनकी भावना पर कुठाराघात करना जैसा होगा। वन अधिकार अधिनियम, 2006 को परिवर्तित कर वन संरक्षण नियम 2022 ने गैर वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि का उपयोग करने से पहले ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने की अनिवार्य आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 वनों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और वनों पर निर्भर अन्य पारंपरिक लोगों को वन अधिकार प्रदान करने के लिए लाया गया था। देश में करीब 20 करोड़ लोगों की प्राथमिक आजीविका वनों पर निर्भर है और लगभग 10 करोड़ लोग वनों के रूप में वर्गीकृत भूमि पर रहते हैं। ये नए नियम उन लोगों के अधिकारों को खत्म कर देंगे, जिन्होंने पीढ़ियों से जंगल को अपना घर माना है। जबकि, उन्हें उनका अधिकार अब तक नहीं दिया जा सका है।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2022 की नई अधिसूचना में ग्राम सभा की सहमति की शर्त को आश्चर्यजनक रूप से पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अब ऐसी स्थिति बन गई है कि एक बार फॉरेस्ट क्लीयरेंस मिलने के बाद बाकी सब बातें औपचारिकता बनकर रह जायेंगी। राज्य सरकारों पर वन भूमि के डायवर्जन में तेजी लाने के लिए केंद्र का और भी अधिक दबाव होगा। मुख्यमंत्री ने अनुरोध किया है कि प्रधानमंत्री इस पर निर्णय लें, ताकि विकास की आड़ में सरल और सौम्य आदिवासी और वनों पर निर्भर रहने वाले लोगों की आवाज ना दबे। सरकार के कानून समावेशी होने चाहिए। ऐसे में वन संरक्षण नियम 2022 में बदलाव लाना चाहिए, जिससे देश में आदिवासियों और वन समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाली व्यवस्था और प्रक्रियाएं स्थापित होंगी।