Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
जंतर-मंतर लाठीचार्ज मामले में सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर, दोषी पुलिसकर्मियों पर FIR की मांग उत्तर पश्चिम पाकिस्तान में फिर हुआ आतंकवादी हमला वेस्टमिंस्टर ब्रिज से टकरा गयी पुलिस की नाव मुख्य अभियोजक करीम खान को पद से हटा दिया गया इजरायली सेना ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अभियान किया सऊदी अरब ने यमन में हवाई हमले किये ड्रोन प्रदर्शनी पर हुए हमले में पंद्रह की मौत गर्मी के मौसम में सीमा पर फैलता जा रहा है दावानल Govinda Karisma Kapoor Movies Breakup: क्यों टूटी गोविंदा और करिश्मा कपूर की सुपरहिट जोड़ी? शगुफ्ता ... भारत बनाम जिम्बाब्वे T20I: अभिषेक शर्मा ने गेंद से मचाया तहलका, 14 साल बाद दोहराया सहवाग का ऐतिहासिक...

केंद्र के कानून पर मुख्यमंत्री ने आपत्ति जतायी

  • आदिवासी पेड़ों की पूजा और रक्षा करते हैं

  • निजी डेवलपर्स को अनुमति देना गलत होगा

  • ग्राम सभी की सहमति के शर्त को गायब कर दिया

रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए उस कानून पर आपत्ति जताई है, जिसमें कहा गया है कि आदिवासियों और वनों पर निर्भर रहने वालों की सहमति सुनिश्चित किए बिना निजी डेवलपर्स वनों को काट सकेंगे। मुख्यमंत्री ने आग्रहपूर्वक इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने आज पत्र के माध्यम से कहा है कि झारखण्ड में 32 प्रकार के आदिवासी रहते हैं, जो प्रकृति के साथ समरसतापूर्वक जीवन जीते हैं। ये पेड़ों की पूजा और रक्षा करते हैं। जो लोग इन पेड़ों को अपने पूर्वजों के रूप में देखते हैं, उनकी सहमति के बिना पेड़ों को काटना उनकी भावना पर कुठाराघात करना जैसा होगा। वन अधिकार अधिनियम, 2006 को परिवर्तित कर वन संरक्षण नियम 2022 ने गैर वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि का उपयोग करने से पहले ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने की अनिवार्य आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 वनों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और वनों पर निर्भर अन्य पारंपरिक लोगों को वन अधिकार प्रदान करने के लिए लाया गया था। देश में करीब 20 करोड़ लोगों की प्राथमिक आजीविका वनों पर निर्भर है और लगभग 10 करोड़ लोग वनों के रूप में वर्गीकृत भूमि पर रहते हैं। ये नए नियम उन लोगों के अधिकारों को खत्म कर देंगे, जिन्होंने पीढ़ियों से जंगल को अपना घर माना है। जबकि, उन्हें उनका अधिकार अब तक नहीं दिया जा सका है।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2022 की नई अधिसूचना में ग्राम सभा की सहमति की शर्त को आश्चर्यजनक रूप से पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अब ऐसी स्थिति बन गई है कि एक बार फॉरेस्ट क्लीयरेंस मिलने के बाद बाकी सब बातें औपचारिकता बनकर रह जायेंगी। राज्य सरकारों पर वन भूमि के डायवर्जन में तेजी लाने के लिए केंद्र का और भी अधिक दबाव होगा। मुख्यमंत्री ने अनुरोध किया है कि प्रधानमंत्री इस पर निर्णय लें, ताकि विकास की आड़ में सरल और सौम्य आदिवासी और वनों पर निर्भर रहने वाले लोगों की आवाज ना दबे। सरकार के कानून समावेशी होने चाहिए। ऐसे में वन संरक्षण नियम 2022 में बदलाव लाना चाहिए, जिससे देश में आदिवासियों और वन समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाली व्यवस्था और प्रक्रियाएं स्थापित होंगी।