सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान स्थिति पर खुलकर प्रकाश डाला
जनता का भरोसा खो रही न्यायपालिका
व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहा है
जबावदेही तय करने का समय आ गया
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्लीः वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उच्च न्यायपालिका के प्रशासनिक कामकाज और उसकी कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोलते हुए चेतावनी दी है कि मास्टर ऑफ रोस्टर (मुकदमों के आवंटन का अधिकार) व्यवस्था, कॉलेजियम के भीतर होने वाले समझौते और जजों के खिलाफ शिकायतों की गोपनीय जाँच प्रक्रिया ने न्यायपालिका में जन-विश्वास का गंभीर संकट पैदा कर दिया है।
कैम्पेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स द्वारा दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक परिचर्चा में बोलते हुए पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि अदालतों के न्यायिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा और बहस होती है, लेकिन मुख्य न्यायाधीशों के अप्रत्यक्ष प्रशासनिक अधिकारों पर कोई बहस नहीं हो पाती।
उन्होंने कहा कि मुकदमों का आवंटन और मुख्य न्यायाधीश का मास्टर ऑफ रोस्टर होना ही एक ऐसा मुख्य प्रशासनिक अधिकार है जो न्यायिक प्रणाली की जवाबदेही को भीतर से नष्ट कर रहा है। जब तक इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया जाएगा, तब तक न्यायपालिका की पारदिर्शिता में कोई प्रगति नहीं हो सकती।
सिब्बल ने विशेष रूप से धन शोधन निवारण अधिनियम से जुड़े राजनीतिक और संवेदनशील मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि जब किसी खास व्यक्ति का मामला एक निश्चित जज की पीठ के समक्ष भेजा जाता है, तो बाहर से ही परिणाम का पता चल जाता है कि राहत नहीं मिलने वाली। ऐसे में याचिकाकर्ता और वकील पूरी तरह से असहाय महसूस करते हैं।
इसके अलावा, सिब्बल ने भ्रष्टाचार या दुर्व्यवहार के आरोपी न्यायाधीशों के खिलाफ आंतरिक जाँच प्रक्रिया की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वर्ष 1999 की आंतरिक प्रक्रिया एक बंद डिब्बे (ब्लैक बॉक्स) की तरह है, जहाँ शिकायतकर्ता या जनता को यह कभी पता ही नहीं चलता कि शिकायत का क्या नतीजा निकला।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब भी जाँच असुविधाजनक स्थिति में पहुँचती है, तो जजों का इस्तीफा देना जवाबदेही से बचने का एक साधारण और आसान रास्ता बन गया है। उन्होंने मांग की कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए प्रशासनिक फैसलों के कारण बताना और पारदर्शी जवाबदेही तय करना बेहद अनिवार्य है।