बांकीपुर सिंड्रोम से चेती बिहार एनडीए?
बंधुआ वोट बैंक की सोच पुरानी हुई
भाजपा के समर्थक जनसुराग की ओर
संपन्नता के मिथक के पीछे गरीबी
रंजीत तिवारी
पटनाः बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों की नींव को हिलाकर रख दिया है। इन नतीजों ने साबित कर दिया है कि मतदाता अब किसी एक पार्टी का बंधुआ वोट बैंक नहीं हैं। न तो सवर्ण अब पूरी तरह भाजपा के साथ सुरक्षित माने जा सकते हैं और न ही मुस्लिम-यादव समीकरण राजद के पाले में पूरी तरह सुरक्षित है।
पारंपरिक रूप से भाजपा जंगलराज का डर दिखाकर सवर्ण और वैश्य मतदाताओं को गोलबंद करती रही है। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाओं ने समीकरण बदल दिए और एनडीए सरकार खुद कटघरे में आ गई। नाराजगी के कारण सवर्णों, यादवों और मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की ओर आकर्षित होने लगा। इस बदलाव ने सत्ताधारी गठबंधन के होश उड़ा दिए।
इसी बांकीपुर सिंड्रोम का असर विधान परिषद की आठ सीटों के लिए घोषित प्रत्याशियों में दिखा। एनडीए ने डैमेज कंट्रोल करते हुए 8 में से 5 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। जदयू ने नीरज कुमार, अभिषेक झा और आनंद पुष्कर को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने सर्वेश कुमार और नरेंद्र प्रसाद सिंह को टिकट दिया।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अलावा सवर्णों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। बिहार सरकार के आर्थिक सर्वे और जाति आधारित गणना के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कुल 43,28,828 सवर्ण परिवारों में से लगभग 25.09 प्रतिशत (10,85,913 परिवार) अत्यंत गरीब हैं। विभिन्न जातियों में भूमिहारों के 27.58%, ब्राह्मणों के 25.32%, राजपूतों के 24.89% और कायस्थों के 13.83% परिवार गरीबी से जूझ रहे हैं। सबसे ज्यादा आवासहीन लोग भी इसी वर्ग से आते हैं।
आर्थिक तंगी और राजनीतिक उपेक्षा ने सवर्णों में असंतोष पैदा किया है। एमएलसी चुनाव में टिकट वितरण से एनडीए ने डैमेज कंट्रोल का प्रयास तो किया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह रणनीति इस वर्ग के पुराने असंतोष को दूर कर पाएगी या वे किसी नए विकल्प का चुनाव करेंगे।