आखिर इस चुनाव आयोग पर नियंत्रण किसका है
संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में यह गंभीर आरोप लगाया है कि देश की चुनावी प्रणाली को कमजोर करने की एक सोची-समझी साजिश रची जा रही है। उनके अनुसार, इस कथित साजिश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक जोड़ी के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) भी शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया का मूल उद्देश्य भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) जैसी संवैधानिक और स्वायत्त संस्था के प्रभाव और गरिमा को कम करना है।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, चुनाव आयोग के कामकाज का प्रबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में तीन चुनाव आयुक्तों की एक त्रयी द्वारा किया जाता है, और ये सभी अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि, हाल ही में सामने आए खुलासे और खुलासे के संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इस प्रशासनिक ढांचे के पीछे पर्दे के पीछे से तीन अन्य सिविल सेवकों या नौकरशाहों की भी सक्रिय भूमिका रही है।
इस पूरी प्रशासनिक और राजनीतिक कहानी की शुरुआत जुलाई 2021 से होती है, जब 1994 बैच के ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी अश्विनी वैष्णव ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की कमान संभाली थी। इसके बाद, अक्टूबर 2022 में 1999 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी अजय भादू को चुनाव आयोग में उप चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया।
इससे पहले उन्होंने गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के सचिव के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं। अजय भादू के साथ-साथ दो अन्य प्रमुख नौकरशाह भी इस परिदृश्य में शामिल हुए: जिनमें 1996 बैच के बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी एच.आर. श्रीनिवासन और आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना शामिल हैं। ये सभी अधिकारी चुनाव आयोग के भीतर आईएएस त्रयी के कुछ सदस्यों के साथ कभी तालमेल बिठाकर तो कभी यादृच्छिक रूप से मतभेद या संघर्ष करते हुए नजर आए। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में विशेष रूप से सीमा खन्ना का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है।
यदि हम तकनीकी विकास और उससे जुड़ी घटनाओं की एक अलग श्रृंखला का अनुसरण करें, तो कई दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। वर्ष 2018 में, इरोनेट को चुनावी नामावली प्रौद्योगिकी प्रबंधन प्रणाली के रूप में शुरू किया जा रहा था। इसे सी-डैक सहित कई प्रमुख सरकारी संस्थानों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया था। इसके बाद, वर्ष 2019 में इस नई और अधिक कुशल समझी जाने वाली प्रणाली को पूरे देश में लागू कर दिया गया और इसका माइग्रेशन किया गया।
इसके ठीक चार साल बाद, यानी 2023 में एक और बड़ा तकनीकी परिवर्तन देखने को मिला, जब चुनाव आयोग के अपने रिकॉर्ड के अनुसार इसके अगले तकनीकी चरण इरोनेट 2.0 को लागू किया गया। उस समय तक, भारत के लाखों मतदाताओं का चुनावी डेटाबेस एक विशाल और व्यापक राष्ट्रीय डिजिटल बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में बदल चुका था। मतदाताओं की सूचियों को पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रबंधित किया जाने लगा, जिसमें लगातार नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया चलती रही।
इन छह सिविल सेवकों—जिनमें तीन चुनाव आयुक्त और तीन अन्य प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं—के इर्द-गिर्द निजी क्षेत्र के साझीदार के रूप में एक मजबूत तकनीकी ढांचा खड़ा नजर आता है। वर्ष 2022-23 के दौरान, सॉफ्टवेयर के क्षेत्र की दिग्गज और टाटा समूह की प्रमुख कंपनी टीसीएस को इरोनेट 2.0 की तकनीकी वास्तुकला के भीतर गहराई से शामिल कर दिया गया।
इसके परिणामस्वरुप सरकारी स्वामित्व वाली संस्था सी-डैक की भूमिका में काफी कमी आ गई। चुनाव आयोग के दिसंबर 2023 के एक भर्ती दस्तावेज में इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था कि ‘इरोनेट 2.0’ और उससे जुड़े अन्य सभी एप्लीकेशन टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज द्वारा विकसित किए गए हैं। वर्तमान में इस प्रणाली के माध्यम से 78 करोड़ से अधिक मतदाताओं का सत्यापन किया है, और लगभग 125 करोड़ मतदाता सूचना पर्चियों के अलावा 25 करोड़ से अधिक मतदाता पहचान पत्र जनरेट किए हैं।
अब विवाद खड़ा होने के बाद धीरे धीरे यह स्पष्ट हो गया कि जनता को धोखा देने के साथ साथ इस पूरी प्रणाली पर दिल्ली का स्पष्ट कब्जा हो गया था। यानी आयोग के अंदर बैठे अधिकारी ही मनमाने तरीके से वोटरों को जोड़ अथवा उनका नाम काट रहे थे। मामला आगे और खुला तो यह भी राज खुलेगा कि बड़ी संख्या में वोटरों के नाम काटने के छपे हुए फॉर्म सात आखिर सिर्फ भाजपा के बूथ एजेंटों तक ही कैसे पहुंचे थे। अब तो हटाये गये मतदाताओं की मांग पर विचार के लिए गठित न्यायाधिकरण के जज भी यह शिकायत कर चुके हैं कि उनकी सिफारिशों का आयोग को पोर्टल पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा। यहां तक कि इस पोर्टल पर उनकी अपनी पहुंच भी नहीं है।