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ओडिशा बंद पर बीजद ने लिया यू-टर्न?

दिल्ली दरबार का का प्रेशर या भुवनेश्वर की मजबूरी

वजूद बचाने का जद्दोजहद जारी

भुवनेश्वर में विपक्ष की पहचान

यू-टर्न पर सफाई में फंसा बीजद

प्रसन्न महांति

भुवनेश्वरः कांग्रेस द्वारा बुलाए गए ओडिशा बंद पर बीजू जनता दल के समर्थन ने राज्य की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि 24 साल तक समदूरस्थ यानी कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान दूरी की राजनीति करने वाली बीजद ने अचानक यह यू-टर्न क्यों लिया? क्या यह दिल्ली का दबाव है या भुवनेश्वर की राजनीतिक मजबूरी? इसका जवाब बीजद के दोहरे संकट में छिपा है।

सत्ता गंवाने के बाद बीजद दिल्ली में लगभग अकेली पड़ गई है। लोकसभा में एक भी सांसद न होने और राज्यसभा में केवल 5 सांसदों के सहारे पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता खो रही है। केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर भाजपा की सरकार होने के कारण बीजद पर केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक अलगाव का भारी दबाव है। राष्ट्रीय राजधानी में अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए उसे इंडिया गठबंधन जैसे बड़े विपक्षी मंच की आवश्यकता महसूस हो रही है। जंतर-मंतर पर विपक्षी धरने में बीजद सांसदों की मौजूदगी इसी दबाव का परिणाम थी, और बंद को समर्थन देना उसी कड़ी का अगला कदम है।

दूसरी ओर, भुवनेश्वर में बीजद की मजबूरी पूरी तरह अलग है। ओडिशा में वह मुख्य विपक्षी दल है, लेकिन इस स्पेस पर कांग्रेस भी अपना दावा मजबूत कर रही है। यदि कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन करती और बीजद चुप रहती, तो मुख्य विपक्षी दल की जगह कांग्रेस के पास चली जाती। अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बीजद को मजबूरी में कांग्रेस के इस कार्यक्रम का समर्थन करना पड़ा, ताकि वह भी जनता के सामने एक मजबूत सरकार-विरोधी चेहरे के रूप में बनी रहे।

इस यू-टर्न पर सफाई देते हुए बीजद की राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुलता देव ने कहा कि पार्टी न तो इंडिया ब्लॉक में शामिल हुई है और न ही एनडीए के साथ है, बल्कि वह केवल जनहित के मुद्दों पर विपक्ष का साथ दे रही है और उसकी समदूरी की नीति आज भी कायम है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब बंद कांग्रेस का हो, मंच विपक्षी गठबंधन का हो और निशाना भाजपा पर हो, तो ऐसी स्थिति में समदूरी का दावा करना विरोधाभासी है।

इस पूरे घटनाक्रम पर पार्टी सुप्रीमो नवीन पटनायक की चुप्पी ने आंतरिक कलह को सतह पर ला दिया है। पार्टी के भीतर दो स्पष्ट धड़े बन चुके हैं। दिल्ली में सक्रिय नेता गठबंधन के पक्ष में हैं, जबकि ओडिशा की जमीनी हकीकत समझने वाला धड़ा इसे पार्टी के लिए आत्मघाती कदम मान रहा है। उन्हें डर है कि कांग्रेस के साथ दिखने से भाजपा बीजद को उसकी बी-टीम बताकर उसका पारंपरिक एंटी-कांग्रेस वोट बैंक हमेशा के लिए छीन सकती है। भाजपा ने इस मौके को भुनाते हुए हमला बोला है कि सत्ता जाते ही बीजद ने अपने सिद्धांतों का सौदा कर लिया है। संक्षेप में, इस बंद ने बीजद के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसमें उसकी दशकों पुरानी समदूरी की नीति दम तोड़ती नजर आ रही है।

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