दिल्ली में महानदी पर समझौता, जल आयोग करेगा फैसला
दो राज्यों के सीएम आमने सामने बैठे
ओडिशा का लाइनलाइन है यह महानदी
बैराज बनने से पानी की आपूर्ति घट गयी
प्रसन्न महांति
भुवनेश्वरः ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच पिछले एक दशक से चल रहे बहुचर्चित महानदी जल विवाद के समाधान की दिशा में नई दिल्ली में एक निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़ आया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में कर्तव्य भवन में आयोजित एक उच्च-स्तरीय बैठक में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आमने-सामने बैठकर आपसी सहमति से इस विवाद को सुलझाने पर अपनी पूरी हामी भर दी।
इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, दोनों राज्यों के मुख्य सचिव, जल संसाधन विभाग के सचिव, मुख्य अभियंता, तकनीकी समिति के सदस्य, साथ ही गृह मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग के वरिष्ठ अधिकारी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। ओडिशा के एडवोकेट जनरल पितांबर आचार्य ने इस बैठक के बाद जानकारी दी कि यह सहमति 30 जुलाई को जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक और 20 सितंबर को भुवनेश्वर में दोनों मुख्यमंत्रियों की मुलाकात के बाद के प्रयासों का परिणाम है।
दोनों मुख्यमंत्रियों और संबंधित अधिकारियों ने केंद्रीय जल आयोग के सचिव के सामने अपनी सहमति दर्ज कराई है। सीडब्ल्यूसी के सचिव ने इस पूरी बातचीत का ब्योरा महानदी वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल के समक्ष रखा, जिसे ट्रिब्यूनल ने अपने रिकॉर्ड में ले लिया है। ट्रिब्यूनल ने भी आपसी सहमति से इस विवाद के समाधान का पूर्ण समर्थन किया है।
इसके बाद दोनों राज्यों ने सीडब्ल्यूसी को औपचारिक पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया है कि केंद्रीय जल आयोग जो भी अंतिम फैसला लेगा, वह दोनों को पूरी तरह से मंजूर होगा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बैठक के बाद प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि महानदी को लेकर लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध अब समाप्त होने की कगार पर है। वर्तमान में दोनों राज्यों और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार होने के कारण एक अनुकूल राजनीतिक व प्रशासनिक माहौल बना है।
गौरतलब है कि महानदी को ओडिशा की जीवन रेखा यानी लाइफलाइन माना जाता है, क्योंकि राज्य की करीब 65 प्रतिशत आबादी पीने के पानी, सिंचाई, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी नदी पर निर्भर है। इस नदी का कुल कैचमेंट एरिया 1,41,600 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 53 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ में और 46 प्रतिशत हिस्सा ओडिशा में आता है।
छत्तीसगढ़ ने अपस्ट्रीम में कलमा, मिरौनी और रविशंकर सागर जैसे सात से आठ बड़े बैराजों का निर्माण कर लिया है, जिसके कारण गैर-मानसून के मौसम में हीराकुंड बांध में पानी का बहाव 30 से 40 प्रतिशत तक घट गया है। इस जल संकट के कारण चिल्का झील, भितरकनिका और सतकोसिया जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों (इको-सिस्टम) पर भी गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।