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आयोग पूरा सच बताए और एसआईआर रद्द करेः लवासा

इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद अब मोर्चे पर दूसरे भी उतरे

तीसरा चरण अभी तुरंत रोक देना चाहिए

आयोग ने आरोपों का खंडन नहीं किया

दो की राय पर एक का फैसला क्यों

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा है कि भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को अपनी कार्यप्रणाली, विशेषकर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठ रहे सवालों पर पूरी तरह से पारदर्शिता बरतनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आयोग को सभी तथ्यों के साथ खुलकर सामने आना चाहिए और एसआईआर के तीसरे चरण में कई कमियों व अनावश्यकता को देखते हुए इसे तुरंत रद्द कर देना चाहिए। लवासा के अनुसार, चूंकि तीसरा चरण अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए आयोग को पुरानी प्री-एसआईआर मतदाता सूचियों पर वापस लौट जाना चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तब से और तेज हो गई है, जब मीडिया रिपोर्ट्स में यह खुलासा हुआ कि अन्य चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर के दौरान आयोग द्वारा लिए गए फैसलों पर लगातार आपत्तियां जताई थीं। इसके बावजूद आयोग अब तक चुनिंदा बयानों और नौकरशाही की भाषा के पीछे छिपा रहा है। हालांकि शनिवार को सीईसी की संधू और जोशी के साथ एक तस्वीर जारी की गई थी, जिसमें मतदाताओं को शांत करने के उपायों की घोषणा की गई थी, लेकिन विपक्षी दलों और लवासा दोनों का मानना ​​है कि यह कदम नाकाफी है।

पूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा कि ईसीआई द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों में विचारों के मतभेद होने के संकेत मिलते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि उन पत्रों का क्या हुआ, क्या उनकी जांच की गई, उनका निस्तारण कैसे हुआ और अंततः क्या फैसले लिए गए? लवासा ने मांग की कि यदि कोई अवैध काम हुआ है, तो जवाबदेही तय की जानी चाहिए और आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दो लोग एक ही राय रखते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसके विपरीत कुछ किया है, तो वही असहमति रखने वाले माने जाएंगे। यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर कैसे एक व्यक्ति की राय बाकी दो पर भारी पड़ गई।

पूर्व चुनाव आयुक्त ने पश्चिम बंगाल में इस गर्मियों में हुए चुनावों से पहले मतदाता सूची में 16 लाख नाम शामिल किए जाने के खिलाफ आई अपीलों को एक बड़ा रहस्य बताया, जिसे ईसीआई को सुलझाना चाहिए। लवासा ने कहा कि ऐसा इतिहास में कभी नहीं हुआ कि किसी एक राज्य में 16 लाख लोगों के नाम जोड़ने के खिलाफ इतनी अपीलें दर्ज की गई हों। आखिर ये अनुरोध किसने किए? यह एक ऐसा रहस्य है जिसकी सफाई निर्वाचन आयोग को देनी चाहिए।