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बीजेडी को मिल रही है राज्य में संजीवनी

बंगाल में गरम और ओड़िसा में नर्म तेवर है भाजपा के

चुनावी आरोपों पर अब कार्रवाई नहीं

खनन घोटाला का आरोप लगाया था

बंगाल में कार्रवाई पर यहां सुस्ती है

प्रसन्न मोहंति

भुवनेश्वर: वर्ष 2024 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा दोनों राज्यों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद दोनों राज्यों की कार्यशैली में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में जहां नीतियां और जांच तेजी से आगे बढ़ रही हैं, वहीं ओडिशा में मोहन माझी सरकार का रुख काफी नरम रहा है। पुराने घोटालों की फाइलों पर सुस्त कार्रवाई के चलते अब विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) को राजनीतिक संजीवनी मिलने लगी है।

चुनाव के दौरान भाजपा ने बीजद सरकार पर 60,000 करोड़ रुपये का खनन घोटाला, 32,000 करोड़ रुपये का चिटफंड घोटाला, जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की चाबी गायब होने और अफसरों द्वारा नेताओं को बंधक बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। गृह मंत्री अमित शाह ने डेढ़ साल में चिटफंड पीड़ितों का पैसा लौटाने और दोषियों को जेल भेजने का वादा किया था।

लेकिन आधा कार्यकाल बीतने के बाद स्थिति अलग है। सरकार का कहना है कि चुनाव परिणामों के बाद जून 2024 में कई दस्तावेज ट्रकों में भरकर गायब कर दिए गए। खनन घोटाले में शाह आयोग की रिपोर्ट और चिटफंड पीड़ितों को राहत देने के वादे पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई है।

पश्चिम बंगाल में सरकार के आते ही आयुष्मान भारत लागू करने और पिछले घोटालों की त्वरित जांच शुरू करने से तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर है। इसके विपरीत, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने बदले की राजनीति के बजाय संतुलन का रास्ता चुना। सरकार ने जगन्नाथ मंदिर के चारों द्वार खोलने, धान पर 3100 रुपये का समर्थन मूल्य देने और सुभद्रा योजना जैसे वादे तो शांति से पूरे किए, लेकिन पुराने भ्रष्टाचार की फाइलों पर सीधी चोट करने से बचती रही।

हार के बाद से बिखरी हुई और आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही बीजद के लिए सरकार का यह नरम रुख वरदान साबित हो रहा है। ग्रामीण स्तर पर बीजद कार्यकर्ताओं को यह सवाल उठाने का मौका मिल गया है कि यदि आधी अवधि में एक भी आरोप साबित नहीं हुआ, तो चुनाव के समय वे बड़े आंकड़े क्यों उछाले गए थे।

साथ ही, वी.के. पांडियन और सुजाता कार्तिकेयन जैसे अधिकारियों को लेकर जनता का गुस्सा अब कम होने लगा है और उनके विकास कार्यों को लेकर सहानुभूति दिखने लगी है। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि जब बंगाल में कुछ ही महीनों में जांच शुरू हो सकती है, तो ओडिशा में आधा कार्यकाल बीतने के बाद भी फाइलें क्यों बंद हैं। आने वाला शेष कार्यकाल ही यह तय करेगा कि जनता का यह बदलता मिजाज राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा।