सुनवाई में देरी और जमानत का विरोध, ऐसा क्योः सुप्रीम कोर्ट
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की सुनवाई में हो रही अत्यधिक देरी और इसके बावजूद आरोपियों की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करने को लेकर महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ ने एक विदेशी नागरिक द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। यह आरोपी भारतीय दंड संहिता, विदेशी अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत मई 2020 से जेल में बंद है।
अदालत ने हालांकि मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन इस तथ्य पर बेहद कड़ा रुख अपनाया कि चार साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभियोजन पक्ष के 45 गवाहों में से केवल दो की ही गवाही पूरी हो सकी है। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने पंजाब के एक हालिया मामले का भी जिक्र किया, जहां उनकी पीठ ने पुलिस अधीक्षक पर 50,000 का जुर्माना लगाया था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, मामले पर समग्रता से विचार करने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद, हमारी राय में इस चरण पर जमानत का कोई मामला नहीं बनता है। हम फिलहाल याचिकाकर्ता को जमानत देने के पक्ष में नहीं हैं… हालांकि, यह कहने के साथ ही हम एक चिंताजनक पहलू भी देख रहे हैं।
याचिकाकर्ता 4 साल से अधिक समय से हिरासत में है और ट्रायल के 45 गवाहों में से केवल 2 की जांच हुई है। यह एक ऐसा पहलू है जो काफी समय से अदालत को परेशान कर रहा है। राज्य सरकार आरोपी की जमानत याचिका का पूरी ताकत से विरोध तो करती है, लेकिन जब बिना किसी देरी के मुकदमा चलाकर अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात आती है, तो वह पूरी तरह से नाकाम साबित होती है… राज्य के वकील ने अनुरोध किया है कि उन्हें इस पहलू पर एक विस्तृत जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का मौका दिया जाए।
नाराज जस्टिस अमानुल्लाह ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, 4 साल से क्या आप कोई अहसान कर रहे हैं? चार्जशीट 90 दिनों के भीतर जमा की जानी चाहिए थी, अन्यथा उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाता। यह किसकी जिम्मेदारी है? हमने पंजाब के एक मामले में नोटिस जारी किया था; मैं पुलिस अधीक्षक पर 50,000 का जुर्माना लगाने का आदेश पारित करने जा रहा हूँ… अब मैं महाराष्ट्र से भी इसकी शुरुआत करूँगा। हर दिन महाराष्ट्र से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। हर दिन, हर दिन एक ही बात…
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालतों में मामलों के भारी बैकलॉग (लंबित मामलों) को देखते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी के मुकदमों में होने वाली देरी पर भी इसी तरह का कड़ा रुख अपनाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए, जिसमें कथित आईएसआईएस सदस्य को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था (जिस पर एनआईए ने साइबर स्पेस के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथी बनाने का आरोप लगाया है), सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए के मुकदमों में प्रणालीगत देरी और ऐसे संवेदनशील मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचे की कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।