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ईडी की गोपनीयता की दलील से असहमत हुए न्यायमूर्ति

संपत्ति जब्ती में गोपनीयता पर न्यायिक मतभेद

  • संपत्ति जब्त हुई तो दर्ज किया जाए

  • उसे छिपाने में पारदर्शिता का अभाव

  • कानून में गोपनीयता की शर्त नहीं है

उत्तर पूर्व संवाददाता

गुवाहाटी: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया में विश्वास करने के कारणों की गोपनीयता को लेकर कानूनी जगत में एक महत्वपूर्ण विमर्श छिड़ गया है। हाल ही में, गुवाहाटी उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने एक समन्वय पीठ के उस दृष्टिकोण से असहमति जताई है, जिसमें यह माना गया था कि संपत्ति कुर्क करने के लिए आवश्यक विश्वास करने के कारणों को गोपनीय रखा जाना चाहिए और उन्हें अनंतिम कुर्की आदेश में दर्ज करना अनिवार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति मनीष चौधरी ने स्पष्ट किया कि पीएमएलए की धारा 5(1) या पीएमएलए नियमों के तहत ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है जो इन कारणों को गोपनीय रखने का निर्देश देती हो। न्यायमूर्ति चौधरी के अनुसार, ईडी का यह कर्तव्य है कि वह प्रभावित व्यक्ति को ये कारण देर-सवेर उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा, यदि विश्वास करने के कारणों को अनंतिम कुर्की आदेश का हिस्सा बना दिया जाता है, तो यह प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होगा। इससे ईडी द्वारा मनमानी जांच की संभावना भी कम हो जाएगी।

न्यायमूर्ति चौधरी ने यह भी रेखांकित किया कि आफताबुद्दीन अहमद बनाम प्रवर्तन निदेशालय मामले में एक अन्य पीठ ने इसके विपरीत राय व्यक्त की थी। न्यायिक अनिश्चितता और परस्पर विरोधी निर्णयों को समाप्त करने के लिए, उन्होंने मामले को एक बड़ी पीठ  के पास भेजने का निर्णय लिया है। बड़ी पीठ को अब दो मुख्य बिंदुओं पर विचार करना होगा: पहला, क्या धारा 5(1) के तहत दर्ज किए जाने वाले विश्वास करने के कारण गोपनीय हैं और क्या इन्हें प्रभावित व्यक्ति को देना अनिवार्य है? दूसरा, यदि इन कारणों को कुर्की आदेश में शामिल किया जाता है, तो क्या यह कानूनी अधिकार क्षेत्र की त्रुटि मानी जाएगी?

यह मामला तब सामने आया जब याचिकाकर्ता ने ईडी द्वारा जारी एक अनंतिम कुर्की आदेश को चुनौती दी। रोचक बात यह है कि इस मामले में गोपनीयता का तर्क स्वयं याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दिया गया था। वकील का यह तर्क था कि विश्वास करने के कारणों को कुर्की की प्रक्रिया शुरू होने से पहले एक अलग फाइल में दर्ज किया जाना चाहिए, न कि सीधे आदेश में। वकील ने तर्क दिया कि यदि अधिकारी इन कारणों को सीधे आदेश में लिखता है, तो यह आदेश की वैधता को समाप्त कर देता है। अब मुख्य न्यायाधीश को इस मामले की सुनवाई के लिए एक बड़ी पीठ का गठन करना होगा, ताकि पीएमएलए के तहत कुर्की की प्रक्रिया को लेकर एक स्पष्ट और निर्णायक न्यायिक नजीर स्थापित की जा सके।