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डोनाल्ड ट्रंप की मनमानियों पर अब वहां कड़ा फैसला आया

सीनेट ने युद्ध शक्ति प्रस्ताव पारित किया

  • इजरायल युद्ध में कूदने से नाराजगी

  • अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ी चोट है

  • गनीमत है कि शांति समझौता हो गया

एजेंसियां

वाशिंगटनः अमेरिकी सीनेट ने मंगलवार, 23 जून 2026 को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए वॉर पावर्स रेजोल्यूशन (युद्ध शक्ति प्रस्ताव) पारित कर दिया है। 50-48 के मत से पारित इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई को रोकने का निर्देश देना है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब राष्ट्रपति ट्रंप का प्रशासन ईरान के साथ एक शांति समझौता करने के प्रयास कर रहा है।

28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ समन्वित सैन्य अभियान शुरू किए थे। इस संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी व्यवधान आया और ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ीं।  यह पहली बार है जब कांग्रेस के दोनों सदनों ने राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए बाध्य करने वाला कोई प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस प्रस्ताव को असंवैधानिक और गैर-बाध्यकारी करार दिया है। वोटिंग के दौरान चार रिपब्लिकन सीनेटरों ने डेमोक्रेट्स का साथ दिया, जिससे राष्ट्रपति की अपनी ही पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के संकेत मिले।

युद्ध को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक संघर्ष विराम समझौता हुआ था जो 8 अप्रैल से लागू है। वर्तमान में दोनों देश एक 60-दिवसीय समझौते के तहत तकनीकी वार्ता कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों को हल करना और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापार को सामान्य बनाना है। दरअसल अधिकांश जनप्रतिनिधि इजरायल के मुद्दे पर इस बात को लेकर नाराज हैं कि ट्रंप का यह युद्धोन्माद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ गया है। जो खर्च इसपर आया है, उसकी कहीं से भरपाई नहीं होगी और यह दूसरे की परेशानी को अपने सर लेने जैसा फैसला रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है। व्हाइट हाउस इसे संवैधानिक आधार पर नजरअंदाज करने की संभावना रखता है। चूंकि यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए व्हाइट हाउस नहीं भेजा जाता है, इसलिए इसकी कानूनी बाध्यता पर आगे अदालती लड़ाइयां देखने को मिल सकती हैं। पेंटागन वर्तमान में ईरान संघर्ष के लिए कांग्रेस से लगभग 80 अरब डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग की मांग कर रहा है, जिसे लेकर सांसदों के बीच काफी चिंता है।