युवा वर्ग को ज्यादा आजमाना खतरनाक खेल
हाल के दिनों में देश की शिक्षा प्रणाली, विशेषकर मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के संचालन को लेकर जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं, उन्होंने देश के नीति-नियंताओं के सामने एक बड़ा नैतिक और प्रशासनिक संकट खड़ा कर दिया है। नीट-यूजी (NEET-UG) परीक्षा में कथित पेपर लीक, धांधली और उसके बाद सामने आए परिणामों की विसंगतियों ने लाखों छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि इसने विपक्षी दलों को केंद्र सरकार, विशेषकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ लामबंद होने का बड़ा आधार भी प्रदान कर दिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल, जिन्हें यहाँ एक रूपक के तौर पर रेखांकित किया गया है, लगातार इस मांग को उठा रहे हैं कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से इस्तीफा देना चाहिए।
विपक्षी दलों का तर्क है कि बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि शिक्षा मंत्रालय अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में अक्षम साबित हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर भी इस मामले पर एक अजीब सी चुप्पी छाई हुई है। पार्टी के नेता खुल कर इस मुद्दे पर कोई ठोस बचाव करने या शिक्षा मंत्री के समर्थन में मुखर होने से बच रहे हैं।
इसका मुख्य कारण यह है कि नीट-यूजी का मुद्दा केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह करोड़ों युवाओं के सपनों और उनके अभिभावकों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। इसके कारण हुई छात्रों की आत्महत्याएं इस मामले को अत्यंत संवेदनशील और मानवीय बना देती हैं। ऐसी स्थिति में, सरकार का कोई भी गैर-जिम्मेदाराना बयान या बचाव की कोशिश जनता के बीच भारी नाराजगी पैदा कर सकती है।
इतिहास गवाह है कि किसी भी देश की युवा शक्ति की अनदेखी करना सत्ता के लिए विनाशकारी साबित होता है। आजादी के बाद से भारत ने कई ऐसे दौर देखे हैं जहाँ युवाओं के आक्रोश ने सत्ता की नींव हिला दी है। 1970 के दशक की शुरुआत में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ छात्र आंदोलन इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है।
उस समय भी, सत्ताधारी दल ने शुरुआती दौर में छात्रों की मांगों को उपेक्षा की दृष्टि से देखा था। तत्कालीन सरकार को लगा कि यह एक सामान्य विरोध है जो समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, उपेक्षा का यही भाव युवाओं के गुस्से में बदल गया। धीरे-धीरे यह आंदोलन सड़कों पर उतर आया और देखते ही देखते इसने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया।
उस समय कांग्रेस के नेताओं का सड़कों पर निकलना तक कठिन हो गया था। उस दबाव और उत्पन्न अराजकता से निपटने के लिए इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की। हालांकि, उस कठोर निर्णय का खामियाजा बाद के चुनावों में कांग्रेस को भारी हार के रूप में भुगतना पड़ा। आज की सरकार को भी इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से सबक लेने की आवश्यकता है।
युवा शक्ति को जरूरत से ज्यादा आजमाना किसी भी सरकार के लिए आत्मघाती हो सकता है। आज का युवा डिजिटल रूप से जागरूक है और अपने अधिकारों के प्रति सजग है। जब उसे यह महसूस होता है कि उसकी मेहनत का फल भ्रष्टाचार या व्यवस्थागत विफलता की भेंट चढ़ रहा है, तो उसका आक्रोश किसी भी राजनीतिक समीकरण को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उस जवाबदेही की मांग है जो लोकतंत्र का आधार है। यदि किसी परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली होती है और युवा जान देने पर मजबूर होते हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की असफलता को दर्शाता है। सुधारात्मक कदम के रूप में केवल जांच समितियां गठित करना या बयानबाजी करना पर्याप्त नहीं है।
आवश्यकता है पारदर्शिता सुनिश्चित करना: परीक्षा प्रक्रिया के हर चरण में तकनीकी और मानवीय स्तर पर पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए। पेपर लीक करने वाले माफियाओं के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने वाले कानून होने चाहिए। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी जैसी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखकर उन्हें विशेषज्ञों के हाथों में सौंपा जाना चाहिए।
सत्ता का वास्तविक अर्थ केवल शासन करना नहीं, बल्कि जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना है। जब देश की युवा पीढ़ी सड़क पर हो और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रही हो, तो सरकार का कर्तव्य यह नहीं है कि वह अपनी साख बचाने के लिए बचाव की मुद्रा अपनाए। इसके विपरीत, सरकार का धर्म है कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करे, जिम्मेदारी तय करे और उन सुधारों को लागू करे जो युवाओं का भरोसा पुनः कायम कर सकें। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि यदि समय रहते इस आक्रोश को शांत नहीं किया गया तो आने वाले समय में इसके परिणाम राजनीतिक रूप से महंगे साबित हो सकते हैं।