बसंत सोरेन की हार शायद अब लोग भूल चुके है
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परिमल नाथवाणी दूसरे राज्यों से भी जीत चुके हैं
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क्रॉस वोटिंग करने वाले नाम सामने नहीं आते कभी
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आरोप प्रत्यारोप के बाद ठंडा हो जाता है मामला
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव हमेशा से ही अपनी जटिल गणित और उठापटक के लिए जाने जाते रहे हैं। हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की चर्चा ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सत्ताधारी गठबंधन के भीतर इस विषय पर एक अजीब सी चुप्पी छाई हुई है।
कांग्रेस ने इस सेंधमारी के लिए राजद और वाम दलों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, जिसके जवाब में उन दलों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना रुख साफ किया। हालांकि, असल बात यह है कि क्रॉस वोटिंग के इस खेल में कांग्रेस और झामुमो के विधायक भी संदेह के घेरे में रहे। इन्हीं मतों के समीकरण ने निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी के लिए राज्यसभा का रास्ता आसान कर दिया।
यह महज एक संयोग नहीं है कि श्री नाथवाणी ने झारखंड के अलावा अन्य राज्यों से भी राज्यसभा का सफर तय किया है। उनकी जीत का इतिहास बताता है कि वे बिना किसी बड़े राजनीतिक ताम-झाम के अपनी जीत सुनिश्चित करने में माहिर रहे हैं। इस परिदृश्य को समझने के लिए हमें जून 2016 के उन ऐतिहासिक राज्यसभा चुनावों को याद करना होगा, जिसने राज्य की राजनीति में क्रॉस वोटिंग की नींव को और गहरा कर दिया था।
उस समय 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में भाजपा के पास 44 और आजसू के 3 विधायकों का समर्थन था, जिससे उनके पास 47 वोट थे—जो दो सीटें जीतने के लिए पर्याप्त थे। दूसरी ओर, झामुमो के बसंत सोरेन को विपक्ष के गठबंधन (झामुमो के 16, कांग्रेस के 6 और जेवीएम के कुछ विधायक) का समर्थन प्राप्त था। हालांकि, विपक्षी खेमा जीत के जादुई आंकड़े 45 तक पहुंचने में नाकाम रहा।
बसंत सोरेन की उस हार ने साबित कर दिया था कि झारखंड में संख्या बल से ज्यादा मैनेजमेंट और क्रॉस वोटिंग मायने रखती है। उस दौर में दलबदल और विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों ने चुनाव को विवादों के केंद्र में ला दिया था। तब से लेकर आज तक, यह प्रक्रिया अनवरत जारी है। झारखंड का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि यहां से कई ऐसे प्रत्याशी राज्यसभा पहुंचे हैं, जिन्हें चुनाव जीतने के बाद दोबारा राज्य की जनता या सदन में शायद ही कभी देखा गया। यह क्रॉस वोटिंग केवल एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति का वह स्याह पक्ष है, जो बार-बार सत्ता और विपक्ष के बीच अविश्वास की खाई को चौड़ा करता रहा है।