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टीएमसी के बागी विधायक अपने सांसदों के फैसले से नाराज

एनसीपीआई के साथ विलय को स्वीकार नहीं करेंगे

  • ऋतब्रत ने मीडिया के सामने बयान दिया

  • हमारी भूमिका राज्य में विपक्ष की ही है

  • मेरे पास 65 विधायकों का समर्थन है

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः तृणमूल कांग्रेस के भीतर गहराता आंतरिक कलह अब खुलकर सामने आ गया है, जिससे पार्टी के भविष्य पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। पार्टी के बागी गुटों के बीच वैचारिक और रणनीतिक असहमति के कारण स्थिति और अधिक जटिल हो गई है, विशेषकर लोकसभा सांसदों और पश्चिम बंगाल विधानसभा के विधायकों के रुख में स्पष्ट अंतर देखा जा रहा है। 14 जून 2026 की रात को तृणमूल के चुनाव चिन्ह पर निर्वाचित 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को सूचित किया कि उन्होंने नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में अपना विलय कर लिया है। इस गुट का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष दस्तीदार ने स्पष्ट किया कि यह समूह अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ मिलकर काम करेगा।

हालाँकि, पार्टी में फूट की यह स्थिति तब और उलझ गई जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पूरी तरह से अलग सुर अलापे। श्री बनर्जी, जो स्वयं को 65 विधायकों का समर्थन प्राप्त होने का दावा करते हैं, ने सोमवार को स्पष्ट किया कि उन्हें एनसीपीआई के साथ विलय के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने कोलकाता में मीडिया से बात करते हुए जोर देकर कहा कि उनकी प्राथमिकता विपक्ष की भूमिका निभाना है और वर्तमान में वे पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल हैं। उन्होंने कहा कि 20 सांसदों का निर्णय उनका अपना सामूहिक फैसला है, जिसका तृणमूल विधायक दल से कोई लेना-देना नहीं है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि श्री बनर्जी का यह स्टैंड काकोली घोष दस्तीदार के गुट के लिए एक बड़ी बाधा बन सकता है। भारतीय राजनीति के दलबदल कानूनों के तहत, किसी भी पार्टी के विलय के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन अनिवार्य होता है। चूंकि ऋतब्रत बनर्जी का गुट इस विलय से इनकार कर रहा है, इसलिए काकोली गुट के लिए पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर अपना दावा पुख्ता करना कानूनी और संवैधानिक रूप से अत्यंत कठिन हो गया है।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी के वफादार गुट ने भी इस घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर बनाए रखी है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया कि तृणमूल एक अविभाज्य राजनीतिक इकाई है। उन्होंने अध्यक्ष से आग्रह किया कि किसी भी बागी गुट को अलग दर्जा न दिया जाए, क्योंकि केवल हस्ताक्षरों के आधार पर किसी भी समूह को मूल पार्टी से अलग होने की मान्यता नहीं दी जा सकती। फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस के भीतर का यह घमासान किस दिशा में जाएगा, यह देखना शेष है।