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दो नावों की सवारी नहीं हो सकती: महेश जेठमलानी

टीएमसी के बागी सांसदों पर विधि विशेषज्ञ की कड़ी टिप्पणी

  • विलय के साथ ही टीएमसी से नाता खत्म

  • विलय कानूनी तौर पर सही पर नैतिक नहीं

  • असली टीएमसी का दावा भी अब गलत हो

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट द्वारा नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया में विलय करने के निर्णय को वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने संवैधानिक और राजनीतिक रूप से आत्मघाती करार दिया है। जेठमलानी ने एक विशेष साक्षात्कार के दौरान स्पष्ट किया कि अब इन बागी सांसदों के लिए यह दावा करना कि वे ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं, पूरी तरह से गलत और अतार्किक है।

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में तृणमूल के बागी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने हाल ही में यह घोषणा की थी कि वे पार्टी के दो-तिहाई बहुमत का दावा कर तृणमूल का नाम और चुनाव चिह्न अपने नाम कराएंगे। बंद्योपाध्याय ने तर्क दिया था कि चूंकि उनके पास संसद में दो-तिहाई संख्या बल है, इसलिए जुलाई में वे आधिकारिक रूप से चुनाव आयोग और अदालत के समक्ष दावा पेश करेंगे। हालांकि, महेश जेठमलानी ने इस रणनीति को सिरे से खारिज करते हुए कहा, आप दो नावों की सवारी एक साथ नहीं कर सकते। जैसे ही आपने दूसरी पार्टी में विलय की घोषणा की, आपने तृणमूल की अपनी सदस्यता त्याग दी है। वह जहाज (तृणमूल) अब आपके पीछे छूट चुका है, आप एक नए जहाज पर सवार हो चुके हैं।

जब उनसे पूछा गया कि एनसीपीआई जैसी छोटी पार्टी के साथ विलय करना, जिसका जनाधार नगण्य है, संवैधानिक रूप से कितना सही है, तो जेठमलानी ने इसे अप्रत्याशित लेकिन कानूनी बताया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक दृष्टिकोण से इसमें कोई तकनीकी दोष नहीं है। यदि कोई सांसद दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए किसी पंजीकृत पार्टी में विलय करता है, तो यह कानूनी प्रक्रिया के भीतर है। उनके अनुसार, यह राजनीति में एक सोची-समझी चाल हो सकती है, लेकिन नैतिकता के बजाय यहाँ कानून का पालन देखना महत्वपूर्ण है।

महेश जेठमलानी ने तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान छवि पर भी तीखे प्रहार किए। उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस एक विश्वसनीयता खो चुकी संस्था बन चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल के शासनकाल में पार्टी और राज्य मशीनरी, विशेषकर पुलिस के बीच कोई अंतर नहीं रह गया था। जेठमलानी ने इसे एक फासीवादी सरकार करार देते हुए कहा कि बागी सांसदों के लिए अब बेहतर है कि वे अपनी एक नई पहचान (ब्रांडिंग) बनाएं, बजाय इसके कि वे एक ऐसी पार्टी से चिपके रहें जिसका अतीत अपराधों और भ्रष्टाचार से भरा हुआ है।

अंततः, जेठमलानी का मानना है कि बागी सांसदों का यह कदम राजनीतिक अस्तित्व के लिए तो हो सकता है, लेकिन तृणमूल का नाम और पहचान हासिल करने का उनका सपना कानूनी और व्यवहारिक रूप से लगभग असंभव है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बागी गुट इस कानूनी दांव-पेच में टिक पाएगा या वे अपनी नई पार्टी के साथ ही राजनीति के मैदान में अपनी पहचान बनाने के लिए मजबूर होंगे।