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राज्य में आदिवासी समुदायों की पारंपरिक शराब को वैध दर्जा मिला

असम की आबकारी नीति में नया प्रावधान

उत्तर पूर्व संवाददाता

गुवाहाटीः असम सरकार ने अपने राज्य में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव को अंजाम देते हुए अपनी नई आबकारी नीति का अनावरण किया है। इस नीति का सबसे प्रमुख और क्रांतिकारी पहलू राज्य के आदिवासी समुदायों द्वारा पीढ़ियों से निर्मित की जाने वाली पारंपरिक शराब को ‘वैध’ दर्जा प्रदान करना है। अब तक, इन पारंपरिक पेय पदार्थों का निर्माण कानूनी अस्पष्टता के दायरे में था, जिसके कारण स्थानीय उत्पादकों को अक्सर कानूनी पेचीदगियों का सामना करना पड़ता था। नई नीति के तहत, अब इन्हें न केवल आधिकारिक मान्यता मिलेगी, बल्कि एक व्यवस्थित और संगठित ढांचे के भीतर इनके उत्पादन और विपणन को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि इस नीतिगत बदलाव से राज्य की स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि अब तक बाजार में मौजूद अवैध और मिलावटी शराब के खतरों पर लगाम लगाई जा सकेगी। सरकार अब पारंपरिक शराब के निर्माण के लिए स्वच्छता और गुणवत्ता के मानक निर्धारित करेगी, जिससे उपभोक्ताओं को सुरक्षित उत्पाद मिल सके। यह कदम न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अवैध निर्माण में शामिल माफियाओं पर भी अंकुश लगाएगा।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों ने असम सरकार के इस फैसले का सकारात्मक स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के साथ-साथ उसे आजीविका के एक सशक्त साधन के रूप में विकसित करने की दिशा में एक साहसिक कदम है।

हालाँकि, इस नीति के क्रियान्वयन को लेकर कुछ वर्गों ने चिंता भी व्यक्त की है। उनका तर्क है कि शराब की सुलभ उपलब्धता से समाज में खपत बढ़ सकती है, जो युवाओं के लिए हानिकारक हो सकती है। इन चिंताओं का जवाब देते हुए राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि पारंपरिक शराब की बिक्री के लिए लाइसेंसिंग की प्रक्रिया बेहद सख्त होगी। साथ ही, बिक्री के स्थानों और समय को लेकर कड़े नियम लागू किए जाएंगे ताकि इसका दुरुपयोग न हो और युवाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यदि असम सरकार का यह प्रयोग अपने उद्देश्यों में सफल रहता है, तो यह पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के लिए एक बेहतर मॉडल साबित हो सकता है।