भारतीय राजनीति के नक़्शे पर पिछले एक सप्ताह की घटनाओं को देखें, तो ऐसा लगता है जैसे कोई सुपरफास्ट ट्रेन बिना किसी स्टेशन पर रुके, सिर्फ पटरियों को चटकाती हुई गुज़री है। और हम? हम वही पुराने, जंग खाए लोहे के पुल हैं—जो न तो उखड़ सकते हैं और न ही अपना स्थान छोड़ सकते हैं। बस, जब भी सत्ता की ये रेल अपने भारी-भरकम इंजनों के साथ ऊपर से गुजरती है, तो हम अपनी पुरानी नींव के साथ थरथराने लगते हैं।
दिल्ली के गलियारों में विपक्षी गठबंधन की बैठक हुई। गठबंधन के नेता जब एक मंच पर आते हैं, तो तस्वीर में एकता कम और अस्तित्व का संघर्ष ज्यादा दिखाई देता है। यह वैसा ही है जैसे एक रेल के डिब्बों को जोड़ा तो गया है, लेकिन हर डिब्बे की दिशा अलग है। इंजन कहीं और खींच रहा है, गार्ड का ब्रेक कहीं और लग रहा है। जनता इस रेल को देख रही है, उम्मीद में कि शायद इस बार यह विकास की पटरी पर दौड़ेगी, लेकिन डर इस बात का है कि कहीं यह पिछली बार की तरह किसी घोटाले के खड्डे में न गिर जाए।
उधर, सरकारी खेमे में हलचल कुछ ऐसी है जैसे स्टेशन मास्टर घंटी बजाकर बता रहा हो कि गाड़ी समय से पहले आएगी। सरकारी प्रवक्ताओं की भाषा में जनसंपर्क अब एक युद्ध कला बन चुका है। नीट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जिस तरह की चुप्पी और बाद में लीपापोती की गई, वह उस पुल की तरह है जिसके नट-बोल्ट ढीले हो चुके हैं, लेकिन ऊपर से पेंट-पुताई कर उसे मजबूत दिखाया जा रहा है। रेल गुजर रही है, धुआं उड़ रहा है, और नीचे खड़ा आम आदमी उसी धुएं में अपनी आंखों की जलन को लोकतंत्र का कण मानकर सह रहा है।
टीएमसी और अन्य क्षेत्रीय दलों के भीतर का घमासान ऐसा है मानो रेल के अंदर रिजर्वेशन के लिए झगड़ा हो रहा हो। जो कल तक साथ थे, वे आज एक-दूसरे को खिड़की से बाहर धकेलने पर आमादा हैं। यह राजनीति है या म्यूजिकल चेयर का खेल? जहाँ संगीत बंद होते ही कुर्सी बदल जाती है, और बैठने वाला शख्स पहले से ही तैयार रहता है कि अगली कुर्सी कहाँ होगी।
प्रधानमंत्री का विदेश दौरा और कूटनीति के मोर्चे पर सक्रियता, ठीक वैसे ही है जैसे रेल की रफ्तार को अचानक बढ़ा देना ताकि यात्रियों को यह न पता चले कि पीछे की बोगियों में क्या हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चमक बढ़ रही है, यह सुखद है, लेकिन देश के भीतर की पटरी की सफाई कौन करेगा? महंगाई की मार, बेरोजगारी का शोर, और संस्थानों की स्वायत्तता पर लगा प्रश्नचिह्न—ये वो झटके हैं जो हर सप्ताह उस पुल को हिला जाते हैं, जिस पर हम खड़े हैं।
इसी बात पर वर्ष 2015 में बनी फिल्म मसान का यह गीत याद आ रहाहै। इस गीत को लिखा था वरुण ग्रोवर ने और संगीत में ढाला था इंडियन ओशन ने। इसे स्वानंद किरकिरे ने अपना स्वर प्रदान किया था।
गीत के बोल इस तरह हैं।
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू किसी बेल सी मचलती है
मैं किसी खंभे सा बिलबिलाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
राजनीति की इस बेल की तरह, जो सत्ता के खंभों पर मचलती है, हमारे राजनेता भी जनता की भावनाओं पर बड़ी चतुराई से लिपटते हैं। बेल को लगता है कि वह खंभे को सहारा दे रही है, जबकि हकीकत में वह खुद खंभे के सहारे आसमान तक पहुँचने की कोशिश में है। और हम? हम वही खंभा हैं, जो न तो उस बेल को झटक पाते हैं, न ही उसे जड़ से उखाड़ पाते हैं। हम बस बिलबिलाते हैं, कभी सोशल मीडिया की पोस्ट पर गुस्सा निकालकर, कभी चाय की दुकानों पर बहस करके।
सप्ताह भर की इन तमाम गतिविधियों का सार यही है कि रेल को अपनी मंजिल का पता है या नहीं, यह कोई नहीं जानता। चालक बदल रहे हैं, गार्ड बदल रहे हैं, डिब्बे पेंट हो रहे हैं, लेकिन पटरी वही पुरानी है। और यह पुल? यह पुल शायद इसी इंतज़ार में थरथराता रहेगा कि कब ये रेल अपनी पूरी गति के साथ अपना असली चेहरा दिखाएगी। अगले सप्ताह फिर एक नई रेल आएगी। नए वादे, नए आरोप, नए गठबंधन और नई थरथराहट। हम फिर पुल बनकर खड़े होंगे। क्योंकि इस देश में नागरिक होना, एक पुल होने जैसा ही है—मजबूत, स्थिर, और अंतहीन कंपन सहने के लिए अभिशप्त।