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स्कैनर के बदले मोबाइल से जांची गयी उत्तर पुस्तिका

सीबीएसई ने परीक्षा जांच में अपने नियमों का उल्लंघन किया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा अपनाई गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हाल ही में, जब कई छात्रों ने अपनी मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन की गई प्रतियां देखीं, तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि डिजिटल पृष्ठों के किनारों पर केवल हस्तलिखित उत्तर ही नहीं, बल्कि स्टेपलर, पेन, कीबोर्ड की तारें और डेस्क पर रखी अन्य वस्तुएं भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं। इन छवियों के सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर सामने आने के बाद शिक्षा जगत में हड़कंप मच गया है। जाहिर है कि इन्हें स्कैनर के बदले मोबाइल से स्कैन किया गया है, जिसकी वजह से अतिरिक्त सामग्रियों नजर आ रही है।

यह पूरा मामला सीबीएसई के सेवा प्रदाता कोएम्प्ट एडुटेक की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। छात्रों और विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर पुस्तिकाओं के स्कैनिंग के दौरान इतनी लापरवाही यह दर्शाती है कि मूल्यांकन प्रक्रिया में डेटा की शुचिता के साथ समझौता किया गया है। स्कैन किए गए पृष्ठों में बाहरी वस्तुओं का दिखना यह साबित करता है कि स्कैनिंग के दौरान पेशेवर उपकरणों का उपयोग करने के बजाय, शायद मोबाइल फोन या गैर-मानक स्कैनिंग उपकरणों का इस्तेमाल किया गया है।

सीबीएसई के मई 2025 के टेंडर दस्तावेजों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि बोर्ड ने तकनीकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बेहद सख्त नियम निर्धारित किए थे। टेंडर में स्पष्ट निर्देश थे कि स्कैनिंग का न्यूनतम रिज़ॉल्यूशन 300 डीपीआई होना चाहिए ताकि लिखावट स्पष्ट दिखे। केवल स्वचालित या रोबोटिक बुक स्कैनर्स का उपयोग किया जाना चाहिए। इन मशीनों को उत्तर पुस्तिकाओं की बाइंडिंग को बिना काटे या नुकसान पहुँचाए डिजिटलीकरण करने में सक्षम होना चाहिए।

हालांकि, वर्तमान में सामने आई तस्वीरें इन सभी तकनीकी शर्तों का उल्लंघन करती हैं। यदि स्कैनिंग के दौरान उत्तर पुस्तिका के पन्नों पर पेन और स्टेपलर जैसी वस्तुएं दिख रही हैं, तो यह सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि न तो रोबोटिक स्कैनर का उपयोग हुआ है और न ही मानकों का पालन किया गया है।

यह विवाद केवल एक तकनीकी चूक का मामला नहीं है, बल्कि यह लाखों छात्रों के भविष्य और मूल्यांकन की निष्पक्षता से जुड़ा है। अभिभावकों और शिक्षाविदों का तर्क है कि यदि स्कैनिंग प्रक्रिया में इतनी पारदर्शिता की कमी है, तो यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि छात्रों के अंकों का मिलान सही तरीके से हुआ है। सीबीएसई के लिए अब यह एक बड़ी चुनौती बन गई है कि वह इस ओएसएम विवाद पर स्पष्टीकरण दे और सेवा प्रदाता की जवाबदेही तय करे, ताकि छात्रों का खोया हुआ भरोसा वापस बहाल हो सके।