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Twisha Sharma Case: ट्विशा शर्मा मौत मामले की जांच करेगी CBI; सुप्रीम कोर्ट सख्त, मीडिया ट्रायल पर जताई नाराजगी

भोपाल/दिल्ली: भोपाल की पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह की बहू ट्विशा (दिव्या) शर्मा की संदिग्ध मौत का हाई-प्रोफाइल मामला अब देश की सबसे सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बागची की खंडपीठ ने इस संवेदनशील और गंभीर मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए बेहद अहम सुनवाई की। इस मामले में तेजी से कार्रवाई करते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की विशेष टीम आज ही भोपाल के लिए रवाना होगी, जिसके बाद स्थानीय भोपाल पुलिस से इस पूरे केस की कमान को आधिकारिक रूप से टेकओवर किया जाएगा।

सीबीआई की टीम भोपाल पहुंचने के बाद लोकल पुलिस से केस डायरी, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अब तक के सभी कानूनी दस्तावेज अपने कब्जे में लेगी। इसके बाद एजेंसी नए सिरे से केस को रिरजिस्टर्ड (दोबारा दर्ज) करके अपनी सघन जांच शुरू करेगी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस घटनाक्रम को पूरे समाज के लिए बेहद चौंकाने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। इस बीच, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने बेंच को सूचित किया कि मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पूर्ण सहमति जताई।

📺 ‘मनगढ़ंत कहानियां दिखाना बंद करे मीडिया’: सीजेआई सूर्यकांत ने मीडिया ट्रायल पर जताई सख्त नाराजगी, पीड़िता के परिवार के प्रति जताई सहानुभूति

अदालती सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस संवेदनशील मामले को लेकर टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर चल रहे अनियंत्रित ‘मीडिया ट्रायल’ पर अपनी गहरी नाराजगी और तीखी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने सख्त लहजे में कहा, “हमें इस दुखद घटना से गहरा आघात लगा है। हम मुख्यधारा और डिजिटल मीडिया से पुरजोर अनुरोध करते हैं कि वे इस मामले से जुड़े गवाहों, मित्रों या रिश्तेदारों के निजी बयानों को खुद से रिकॉर्ड कर उन्हें प्रसारित न करें।”

जब अदालत में आरोपी पक्ष के वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने स्थानीय अखबारों में लगातार छप रहे एकतरफा बयानों का हवाला दिया, तो सीजेआई ने तल्ख लहजे में टिप्पणी की कि हम इस तरह की किसी भी मनगढ़ंत कहानियों के पूरी तरह खिलाफ हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर स्पष्ट किया कि पीड़िता के पीड़ित परिवार के साथ अदालत की पूरी सहानुभूति है और देश के कानून के तहत हर हाल में पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित की जाएगी।

⚖️ शुरुआती जांच में ‘संस्थागत पक्षपात’ और सबूत मिटाने के गंभीर आरोप: एफआईआर दर्ज करने में ३ दिन की देरी पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष (मृतका के मायके) की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ अधिवक्ता लूथरा ने अदालत में स्थानीय प्रशासन द्वारा किए गए ‘संस्थागत पक्षपात’ का बड़ा मुद्दा उठाया। उन्होंने बेंच के सामने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चूंकि मुख्य आरोपी खुद राज्य की एक रसूखदार पूर्व जिला जज हैं, इसलिए स्थानीय पुलिस द्वारा शुरुआती जांच में जानबूझकर घोर ढिलाई बरती गई।

अधिवक्ता लूथरा ने कोर्ट को बताया कि घटना के बाद एफआईआर (FIR) दर्ज करने में ही पुलिस ने तीन दिन की लंबी देरी की और क्राइम सीन पर साक्ष्यों को ठीक से सील या सुरक्षित नहीं रखा गया। उन्होंने आशंका जताई कि मुख्य आरोपियों के बाहर रहने से रोज नए सबूतों को नष्ट करने और गवाहों को प्रभावित करने का गंभीर खतरा बना हुआ है।

🔍 पूर्व जिला जज पर जांच में सहयोग न करने और चैनलों पर मृतका को बदनाम करने का आरोप: सॉलीसिटर जनरल ने कोर्ट को दी जानकारी

सुनवाई में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोपी पूर्व जिला जज के आचरण और रवैये पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट को अवगत कराया कि— “आरोपी पूर्व जज जांच का सामना करने के बजाय अलग-अलग टीवी चैनलों पर इंटरव्यू देकर मृतका के चरित्र को बदनाम करने की कोशिश कर रही हैं। पुलिस प्रशासन ने कई बार उनके आवास पर जाकर बयान दर्ज करने का लिखित अनुरोध किया, यहां तक कि महिला पुलिस टीम उनके घर जाने को भी तैयार थी, लेकिन वे जांच में कतई सहयोग नहीं कर रही हैं।”

सॉलीसिटर जनरल के इस तीखे आरोप के जवाब में आरोपी पक्ष के वकील ने तुरंत बचाव करते हुए दावा किया कि उनकी मुवक्किल द्वारा अब तक पुलिस के सामने तीन बार अपना विस्तृत बयान दर्ज कराया जा चुका है और वे किसी भी जांच से भाग नहीं रही हैं।

🤝 राज्य सरकार द्वारा CBI को केस सौंपने के फैसले का सुप्रीम कोर्ट ने किया स्वागत: जस्टिस बागची बोले— ‘अब यह प्रशासनिक मामला’

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जांच सीबीआई को सौंपे जाने के त्वरित फैसले का सुप्रीम कोर्ट ने खुले दिल से स्वागत किया। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि जब राज्य सरकार ने खुद आगे बढ़कर केस को केंद्रीय एजेंसी (CBI) को ट्रांसफर कर दिया है, तो अब देश की सर्वोच्च अदालत को इसमें सीधे हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है।

वहीं, खंडपीठ के सदस्य जस्टिस बागची ने अपनी महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी में कहा कि अब यह मामला पूरी तरह से राज्य सरकार और सीबीआई के बीच का एक प्रशासनिक विषय बन चुका है। केंद्र सरकार द्वारा इसकी आधिकारिक अधिसूचना (Notification) जारी होने के बाद केंद्रीय जांच एजेंसी इसे पूरी तरह अपने हाथों में लेगी और कानून सम्मत तरीके से अपनी फाइनल चार्जशीट पेश करेगी।