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Jharkhand High Court Decision: हिरासत में मौत की जांच अब सिर्फ न्यायिक मजिस्ट्रेट करेंगे, हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने हिरासत में मौत के मामलों की जांच को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि हिरासत में मौत के मामलों की जांच केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही कराई जा सकती है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) द्वारा की गई जांच को कानून के अनुरूप नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि “कानून का शासन केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकता।”

📊 कार्यपालक दंडाधिकारी की जांच पर उठे सवाल: 262 मामलों की होगी दोबारा जांच

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने जनहित याचिका (W.P. PIL 1218/2022) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। राज्य सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में बताया गया कि 427 कस्टोडियल डेथ में से 262 मामलों में कार्यपालक दंडाधिकारी द्वारा जांच कराई गई थी। अदालत ने इसे कानून का उल्लंघन माना और निर्देश दिया कि इन सभी मामलों की दोबारा न्यायिक जांच कराई जाए।

📜 कानून का हवाला: CrPC और BNSS के तहत न्यायपालिका की जवाबदेही

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) के तहत जांच का अधिकार केवल न्यायिक दंडाधिकारी को है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के डीके बासु और निलाबती बेहरा जैसे ऐतिहासिक फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि हिरासत में मौत संविधान के अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन है और इसके लिए राज्य की जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

🚨 प्रशासन को सख्त निर्देश: 24 घंटे में देनी होगी सूचना, लापरवाही पर होगी कार्रवाई

अदालत ने निर्देश दिया है कि हिरासत में मौत, गायब होने या बलात्कार जैसी घटना होने पर DM और SP को 24 घंटे के भीतर NHRC, SHRC और प्रधान जिला न्यायाधीश को सूचना देनी होगी। सूचना मिलने के 48 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट को जांच के लिए नामित करना अनिवार्य होगा। साथ ही, जेल अधीक्षक या थाना प्रभारी को पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज जैसे दस्तावेज 7 दिनों के भीतर उपलब्ध कराने होंगे।

💰 पीड़ित परिवारों के लिए राहत: 30 दिनों के भीतर शुरू होगी मुआवजे की प्रक्रिया

कोर्ट ने एक मानवीय पहल करते हुए आदेश दिया कि यदि जांच रिपोर्ट में हिरासत में हिंसा या लापरवाही की पुष्टि होती है, तो जिला पीड़ित प्रतिकर समिति (DLSA) स्वतः संज्ञान लेते हुए मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू करेगी। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जांच रिपोर्ट आने के 30 दिनों के भीतर पीड़ित परिवार को राहत दिलाने की कार्रवाई शुरू हो जाए।

🛠️ भविष्य की कार्ययोजना: SOP तैयार करने और ट्रेनिंग के निर्देश

हाईकोर्ट ने झारखंड न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया है कि वे जांच के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) और रिपोर्ट का मॉडल फॉर्मेट 4 महीने में तैयार करें। इसके अलावा, राज्य सरकार और अकादमी मिलकर न्यायिक अधिकारियों, पुलिस और डॉक्टरों के लिए संयुक्त संगोष्ठी आयोजित करेंगे, ताकि सभी को नए नियमों और न्यायिक जांच की अनिवार्य प्रक्रिया की पूरी जानकारी हो सके।