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एआईएडीएमके अब दो गुटों में बंट चुका है

महाराष्ट्र का राजनीतिक नाटक अब तमिलनाडु में भी

  • बागी गुट का सरकार को समर्थन

  • पलानीस्वामी के पास कम विधायक

  • दोनों गुटों का एक दूसरे पर आरोप

राष्ट्रीय खबर

चेन्नईः भारतीय राजनीति में यह सवाल अक्सर उठता रहा है कि क्या खंडित जनादेश राजनीतिक दलों के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाता है? तमिलनाडु में अम्मा की पार्टी एआईएडीएमके के भीतर हाल ही में आई दरार ने इस चर्चा को फिर से हवा दे दी है। यह घटनाक्रम काफी हद तक महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन की याद दिलाता है, जहां एक गुट ने बगावत कर पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया था।

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई। डीएमके को 59 और एआईएडीएमके को 47 सीटें मिलीं। इस अस्थिर स्थिति ने राज्य में जोड़-तोड़ की राजनीति का रास्ता खोल दिया।

बुधवार को सदन में शक्ति परीक्षण के दौरान एआईएडीएमके के भीतर का असंतोष फूट पड़ा। पार्टी महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के स्पष्ट व्हिप के बावजूद, सी.वी. षणमुगम और एस.पी. वेलुमणि के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट ने विजय की अल्पसंख्यक सरकार को समर्थन दे दिया। इस बगावत ने एआईएडीएमके को लंबवत विभाजित कर दिया है।

वर्तमान में स्थिति यह है कि 25 विधायक (टीवीके सरकार के समर्थन में) हैं। आधिकारिक गुट के पास 22 विधायक हैं। ईपीएस ने आरोप लगाया कि विधायकों को मंत्री पद और बोर्ड अध्यक्ष जैसे पदों का लालच देकर तोड़ा जा रहा है। दूसरी ओर, असंतुष्ट नेताओं का दावा है कि पलानीस्वामी ने प्रतिद्वंद्वी डीएमके के साथ गुप्त समझौता करने की कोशिश की थी, जो पार्टी कार्यकर्ताओं को मंजूर नहीं था।

जून 2022 में महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने ठीक इसी तरह शिवसेना के दो-तिहाई विधायकों के साथ बगावत कर उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी थी। तमिलनाडु में भी अब एआईएडीएमके बनाम एआईएडीएमके की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई शुरू होने के आसार हैं। विधायकों द्वारा प्रो-टेम स्पीकर को पत्र लिखकर एस.पी. वेलुमणि को विधायक दल का नेता नियुक्त करने की मांग करना, इस दरार को और गहरा बनाता है।