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सबसे मजबूत दांत वाले प्राणियों से इथियोपिया को फायदा

यहां इंसान उन्हें नियमित खाना खिलाते हैं

  • सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है

  • यहां के कसाईखानों के सफाईकर्मी हैं वे

  • बीमारियों को फैलने से भी रोक देते हैं

एजेंसियां

हरारः इथियोपिया के प्राचीन शहरों की गलियों में रात के सन्नाटे को चीरती एक डरावनी हंसी गूंजती है, जिसे सुनकर किसी भी अनजान व्यक्ति के रोंगटे खड़े हो सकते हैं। लेकिन इथियोपिया के हरार और मेकेले जैसे शहरों के लिए यह शोर किसी खतरे का संकेत नहीं, बल्कि शहर की सफाई व्यवस्था के सक्रिय होने का प्रमाण है। हड्डियों को चबा जाने वाले इन लकड़बग्घों (हायना) और इंसानों के बीच का रिश्ता यहाँ सदियों पुराना और बेहद अनोखा है।

इथियोपिया के पवित्र शहर हरार की 16वीं शताब्दी की दीवारों के भीतर एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। अब्बास यूसुफ, जिन्हें वहां हाइना मैन के नाम से जाना जाता है, रात होते ही इन हिंसक जानवरों को उनके नाम से पुकारते हैं। वे कमरिया (चांद जैसी), चाल्तू (परिष्कृत) और जरजारा (जल्दबाज) जैसे नामों से जब इन जानवरों को आवाज देते हैं, तो अंधेरे से निकलकर लकड़बग्घे उनके पास चले आते हैं। अब्बास अपने मुंह में दबी एक लकड़ी की सींक पर मांस का टुकड़ा रखकर इन खतरनाक शिकारियों को खिलाते हैं।

यह परंपरा 1950 के दशक में अब्बास के पिता यूसुफ मुमे सालेह ने शुरू की थी। शुरू में इसका उद्देश्य इन जानवरों को पालतू मवेशियों पर हमला करने से रोकना था, लेकिन धीरे-धीरे यह हरार की संस्कृति का हिस्सा बन गया। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल इस शहर की दीवारों में विशेष रूप से वारबा नुदुल यानी लकड़बग्घों के निकलने के लिए छेद बनाए गए हैं, ताकि वे रात में शहर में आकर कसाईखानों का कचरा साफ कर सकें।

इथियोपिया के उत्तर में स्थित मेकेले शहर में डॉ. गिदेय यिरगा द्वारा किए गए शोध से इन जानवरों की एक नई छवि सामने आई है। शेफील्ड विश्वविद्यालय और मेकेले विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, लकड़बग्घे और अन्य शिकारी जानवर हर साल लगभग 5,000 मीट्रिक टन जैविक कचरे का निपटान करते हैं। इससे नगर परिषद को कचरा प्रबंधन के खर्च में सालाना लगभग 100,000 की बचत होती है।

ये जानवर न केवल सड़कों पर सड़ने वाले मांस को खाकर प्रदूषण रोकते हैं, बल्कि एंथ्रैक्स और बोवाइन ट्यूबरकुलोसिस जैसी घातक बीमारियों के प्रसार को रोकने में भी मदद करते हैं। मेकेले के 72 फीसद घरों का मानना है कि ये जानवर पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद हैं। वे एक पारिस्थितिकी तंत्र सेवा प्रदान कर रहे हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है।

हालांकि यह सह-अस्तित्व हमेशा शांतिपूर्ण नहीं रहा। 2020-2022 के दौरान टिग्रे युद्ध ने इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ दिया। भोजन की कमी के कारण लकड़बग्घों ने मवेशियों और कभी-कभी मानवीय अवशेषों पर हमला करना शुरू कर दिया। विस्थापित लोगों के शिविरों में रहने वाले लोग आज भी इन हमलों के प्रति संवेदनशील हैं। इसके बावजूद, इथियोपिया के कई हिस्सों में लकड़बग्घों को शहरी सफाईकर्मी के रूप में सम्मान प्राप्त है, जो इंसानों के साथ मिलकर प्रकृति के चक्र को बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।