अब फिर से जुमला का रोना होगा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद, अब धरातल पर उन वादों को उतारने की चुनौती है जिन्होंने इस चुनावी समर की दिशा तय की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान एक अत्यंत महत्वाकांक्षी प्रतिज्ञा की थी—राज्य में भाजपा सरकार बनते ही महज 45 दिनों के भीतर भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने (फेंसिंग) का कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
यह वादा न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि सुरक्षा विशेषज्ञों और पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच एक गंभीर बहस का केंद्र बन गया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि निवर्तमान तृणमूल कांग्रेस सरकार और केंद्र सरकार के बीच भूमि अधिग्रहण को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही थी। सीमा सुरक्षा बल को फेंसिंग के लिए आवश्यक 600 एकड़ भूमि हस्तांतरित न करना एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध था।
अब चूंकि राज्य और केंद्र में एक ही दल की सत्ता है, तो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में आने वाली प्रशासनिक अड़चनें निश्चित रूप से कम होंगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या 45 दिन की अवधि इस जटिल कार्य के लिए पर्याप्त है? सुरक्षा विशेषज्ञों, जिनमें पूर्व बीएसएफ महानिदेशक प्रकाश सिंह और पूर्व आईबी निदेशक शामिल हैं, ने इस समयसीमा को अवास्तविक और राजनीतिक जुमला करार दिया है।
सीमा पर बाड़ लगाना केवल खंभे गाड़ने और तार खींचने का काम नहीं है। इसमें कानूनी पचड़े, पुनर्वास की समस्याएँ, मुआवजे का वितरण और सबसे महत्वपूर्ण—भौगोलिक चुनौतियाँ शामिल हैं। बंगाल की सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदी तटीय और दलदली क्षेत्रों से गुजरता है, जहाँ पारंपरिक फेंसिंग तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।
भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसमें से बंगाल का हिस्सा सबसे संवेदनशील माना जाता है। 1975 के भारत-बांग्लादेश सीमा दिशा-निर्देशों के अनुसार, जीरो लाइन के 150 गज के भीतर कोई भी रक्षा ढांचा नहीं बनाया जा सकता। भारत का तर्क है कि उसकी सिंगल-रो फेंसिंग रक्षा ढांचा नहीं बल्कि एक सुरक्षा उपाय है, फिर भी सीमा पर कोई भी निर्माण अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संवेदनशीलता का विषय होता है।
आधुनिक युग में केवल शारीरिक बाधाएँ (बाड़) पर्याप्त नहीं हैं। सरकार स्मार्ट-टेक्नोलॉजी आधारित गैजेट्स, सेंसर, लेजर और रडार प्रणाली पर जोर दे रही है। हालांकि, गृह मंत्रालय का एक हालिया और अपरंपरागत प्रस्ताव—नदी तटीय क्षेत्रों में मगरमच्छों और सांपों को तैनात करना—विवादों के घेरे में है।
विशेषज्ञों ने इसे मूर्खतापूर्ण विचार बताते हुए आगाह किया है कि बाढ़ जैसी स्थितियों में ये जीव सीमा पर रहने वाले निर्दोष भारतीय नागरिकों के लिए ही खतरा बन जाएंगे। प्रकृति को सुरक्षा कवच बनाना सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसका व्यावहारिक कार्यान्वयन सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा सकता है। भाजपा के लिए घुसपैठ का मुद्दा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक जनसांख्यिकीय बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में पेश किया गया।
अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी ने घुसपैठियों को रोजगार और राशन छीनने वाला बताकर ध्रुवीकरण की एक मजबूत लहर पैदा की। अब सत्ता में आने के बाद, इस नैरेटिव को वास्तविकता में बदलने का दबाव सरकार पर है। कोलकाता उच्च न्यायालय ने पहले भी राज्य सरकार को भूमि हस्तांतरण में देरी के लिए फटकार लगाई थी, जिससे स्पष्ट है कि न्यायिक और प्रशासनिक मंशा अब फेंसिंग के पक्ष में है।
फिर भी, 45 दिनों का लक्ष्य तय करना प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक लाभ का कदम प्रतीत होता है। सीमा को पूरी तरह सील करना तकनीकी रूप से लगभग असंभव है, लेकिन इसे अभेद्य बनाना संभव है। नई सरकार को चाहिए कि वह बयानबाजी के बजाय वैज्ञानिक समाधानों, सुचारू भूमि अधिग्रहण और पड़ोसी देश के साथ कूटनीतिक समन्वय पर ध्यान केंद्रित करे।
राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर 45 दिन जैसी समयसीमा तय करना प्रशासन पर अनावश्यक दबाव डाल सकता है, जिससे कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होने का डर रहता है। बंगाल की जनता अब इस डबल इंजन सरकार से ठोस परिणाम की अपेक्षा कर रही है। लेकिन खतरा इस बात का है कि नरेंद्र मोदी के पंद्रह लाख हर खाता जैसा यह भी एक जुमला साबित ना हो जाए।
जिस चुनाव में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा इतनी तेजी से उछाला गया है, उन बांग्लादेशियों को खोज निकालने की जिम्मेदारी भी अब अमित शाह की है। केंद्रीय गृह मंत्री अब यह दलील भी नहीं दे सकते कि राज्य सरकार उनके काम में अड़ंगा लगा रही है। साथ ही जिन मतदाताओँ के नाम काटे गये थे, उनमें से कितने विदेशी साबित होते हैं, इसकी भी परख हो जाएगी। कहीं ऐसा ना हो कि यह भी एक चुनावी जुमला साबित हो जाए।