अरुणाचल प्रदेश की सिविल सोसायटी का आंदोलन और तेज हुआ
उत्तर पूर्व संवाददाता
गुवाहाटीः अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक हलचल उस समय तेज हो गई जब अरुणाचल सिविल सोसाइटी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू से जांच पूरी होने तक पद छोड़ने की मांग की। यह मांग सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय जांच ब्यूरो को मुख्यमंत्री के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की प्रारंभिक जांच करने के आदेश के बाद उठी है। शीर्ष अदालत ने यह आदेश उन आरोपों के आधार पर दिया है जिनमें दावा किया गया है कि पिछले दस वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्यों से जुड़ी कंपनियों को लोक निर्माण विभाग के करोड़ों रुपये के ठेके नियमों को ताक पर रखकर दिए गए।
ईटानगर के आईजी पार्क स्थित टेनिस कोर्ट में आयोजित तीन दिवसीय धरने के दौरान प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग केवल दोष सिद्ध करने के बारे में नहीं है, बल्कि जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए है। सिविल सोसायटी के अध्यक्ष ब्याबंग जोराम ने तर्क दिया कि जब तक पेमा खांडू मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे, तब तक एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच संभव नहीं है, क्योंकि वे स्वयं पीडब्ल्यूडी विभाग का प्रभार भी संभाल रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि पद पर रहते हुए वे जांच को प्रभावित कर सकते हैं या अधिकारी उनके दबाव में आकर सच बोलने से कतरा सकते हैं।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए किसी भी गलत कार्य से इनकार किया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के आदेश का स्वागत किया और जांच एजेंसी को पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया है। मंगलवार को मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, इस मामले में मेरी कोई संलिप्तता नहीं है। मैं अदालत के आदेश का सम्मान करता हूँ और सच्चाई जल्द ही सामने आएगी — दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। राज्य सरकार ने भी सीबीआई के साथ समन्वय के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने की बात कही है।
सिविल सोसायटी के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध राजनीतिक रूप से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह जवाबदेही और कानून की उचित प्रक्रिया का मामला है। उन्होंने अन्य राज्यों के उदाहरण देते हुए कहा कि नैतिकता के आधार पर कई नेताओं ने जांच के दौरान पद छोड़ा है और निर्दोष पाए जाने पर वे पुनः पद ग्रहण कर सकते हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि मुख्यमंत्री तीन दिनों के भीतर इस्तीफा नहीं देते हैं, तो वे अपने लोकतांत्रिक आंदोलन को और अधिक उग्र करेंगे। वर्तमान में राज्य प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बना हुआ है, जबकि सबकी नजरें सीबीआई की प्रारंभिक रिपोर्ट पर टिकी हैं।