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परिवर्तन के बदले प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही

मोदी की अपील का पश्चिम बंगाल पर कोई असर नहीं

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर ने भले ही भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत दिला दिया हो, लेकिन धरातल पर हत्या, आगजनी, और तोड़फोड़ की खबरों ने एक बार फिर राज्य के पुराने और डरावने चुनावी इतिहास को दोहरा दिया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की भारी मौजूदगी के बावजूद, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और संपत्तियों को निशाना बनाने की खबरें सामने आ रही हैं।

भाजपा ने परिवर्तन का नारा दिया था और मतदाताओं ने भी उसी बदलाव के लिए वोट किया, लेकिन हिंसा के जो दृश्य उभर रहे हैं, वे किसी वास्तविक बदलाव की जगह मध्ययुगीन बर्बरता की कहानी बयां कर रहे हैं। जिस चुनावी हिंसा को लेकर भाजपा कभी ममता बनर्जी सरकार को घेरती थी, अब सत्ता परिवर्तन के बाद भी वही मंजर दिखाई दे रहा है।

सोमवार को जैसे ही चुनाव परिणाम स्पष्ट हुए, राज्य के विभिन्न हिस्सों से झड़पों की खबरें आने लगीं। मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस ने दावा किया कि बीरभूम के नानूर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके एक कार्यकर्ता की कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी। पश्चिम बंगाल पुलिस के अनुसार, सोमवार दोपहर से ही कोलकाता के टॉलीगंज और कस्बा सहित बारुइपुर, कमरहाटी, बरानगर, हावड़ा और बहरामपुर में टीएमसी के दफ्तरों में भीड़ द्वारा तोड़फोड़ की गई है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लाठी-डंडों से लैस भीड़ उन लोगों का पीछा करती दिख रही है, जिन्हें टीएमसी अपना कार्यकर्ता बता रही है। टीएमसी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा के झंडे लिए कुछ लोग घर-घर जाकर मांसाहारी दुकानों और बिरयानी विक्रेताओं को डरा रहे हैं और उन्हें अपनी दुकानें बंद करने या नाम हटाने की धमकी दे रहे हैं।

निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए 10 सदस्यीय तथ्य-खोज समिति द्वारा जांच की घोषणा की है। तृणमूल कांग्रेस ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, यही वह परिवर्तन है जिसे भाजपा इस मिट्टी पर लेकर आई है; दुःस्वप्न शुरू हो चुका है। पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने कथित तौर पर टीएमसी को 24 घंटे के भीतर खत्म करने की बात कही थी।

दूसरी ओर, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने प्रशासन से आग्रह किया है कि हिंसा करने वालों के खिलाफ राजनीतिक संबद्धता देखे बिना कड़ी कार्रवाई की जाए। हालांकि, भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए सुझाव दिया कि ये घटनाएं टीएमसी के भीतर ही प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच आपसी हताशा का परिणाम हो सकती हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक लंबा और काला इतिहास रहा है, जो वामपंथी शासन (1977-2011) से शुरू होकर तृणमूल शासन में भी जारी रहा, और अब सत्ता के इस नए दौर में भी थमता नजर नहीं आ रहा है।