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एबार भोट दितेई होवे ना होले बांग्लादेश पाठिये देबे

लोकतंत्र का स्वाद और रांची की मिठाई दुकानों से गायब कारीगर

  • सबसे ज्यादा संकट रसगुल्ले का है

  • नागरिक जिम्मेदारी से ज्यादा भय

  • पहचान की जंग की जद्दोजहद

प्रकाश सहाय

रांचीः रांची की प्रसिद्ध मिठाई दुकानों के शोकेस आज खाली पड़े थे। शहर की हवा में वह चिर-परिचित केसरिया और इलायची वाली खुशबू गायब थी। परिचित की दुकान के बाहर खड़ा एक ग्राहक झुंझलाकर पूछ रहा था, अरे भाई, रसगुल्ले कहाँ गए? जवाब मिला, कारीगर बाबू बंगाल चले गए, वोट देने।

यही हाल शहर के बड़े होटलों का था। कहीं वेटर नदारद थे, तो कहीं रसोइया गायब। पर असली कहानी रांची से सैंकड़ों किलोमीटर दूर गुरुग्राम की ऊंची इमारतों में भी दोहराई जा रही थी। वहां के आलीशान फ्लैटों में रहने वाले लोग परेशान थे क्योंकि किचन और क्लीनिंग का सारा गणित बिगड़ चुका था। जिन हाउस-हेल्प्स को लोग अक्सर बांग्लादेशी कहकर संबोधित करते थे, वे रातों-रात गायब हो गई थीं। उनके फोन स्विच ऑफ थे और घरों में काम का पहाड़ खड़ा था।

पहली नज़र में यह लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा लग सकती है, लेकिन जब इन लोगों से उनके पैतृक गांवों (पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाके) में बात की गई, तो एक अलग ही परत खुलकर सामने आई। यह पलायन केवल मतदान के उत्साह के कारण नहीं, बल्कि एक गहरे और अनकहे डर की वजह से था।

मालदा जिले के एक छोटे से गांव में पहुंची सुमोती, जो गुरुग्राम के एक पेंटहाउस में काम करती थी, ने असलियत बयां की। उसने बताया, साहब, हमें वोट के उत्साह से ज्यादा अपनी पहचान की फिक्र है। शहर में लोग हमें विदेशी कहते हैं। हमें डर है कि अगर इस बार हमने वोट नहीं दिया, तो कहीं हमें सचमुच विदेशी घोषित न कर दिया जाए।

रांची के उन कारीगरों के लिए भी वोट डालना केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच बन गया है। उनके मन में यह बात बैठ गई है कि उंगली पर लगी नीली स्याही ही वह सबसे बड़ा प्रमाण है जो साबित करेगा कि वे इसी मिट्टी के हैं। उन्हें डर है कि अनुपस्थिति का मतलब उनकी नागरिकता पर सवालिया निशान हो सकता है।

नतीजतन, शहरों की रफ्तार थम सी गई है। कहीं रसगुल्लों की मिठास कम हो गई है, तो कहीं रोजमर्रा की सुख-सुविधाएं गायब हैं। यह स्थिति हमें अहसास दिलाती है कि जिन लोगों को हम अक्सर अदृश्य मान लेते हैं, उन्हीं के कंधों पर शहर का पहिया टिका है। और आज, उसी पहिये को चलाने वाले लोग अपनी जड़ों को बचाने की जद्दोजहद में अपनी पहचान की स्याही लगवाने कतारों में खड़े हैं। यह कहानी केवल चुनाव की नहीं, बल्कि अस्तित्व और उस विश्वास की है, जिसे हासिल करने के लिए एक गरीब कामगार सैकड़ों मील का सफर तय करने को मजबूर है।